अजमेर में राष्ट्रीय संगोष्ठी में विधायक डॉ. लालाराम बैरवा ने महर्षि दयानंद के स्वदेशी, स्वधर्म और स्वराज विचारों को प्रासंगिक बताया।
शाहपुरा। महर्षि दयानंद सरस्वती का चिंतन केवल धर्म और समाज सुधार तक सीमित नहीं था, बल्कि उनके विचारों में राष्ट्र निर्माण, आत्मसम्मान और स्वतंत्रता चेतना की मजबूत वैचारिक नींव दिखाई देती है। इसी विषय को लेकर महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय, अजमेर में आयोजित एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में देश के विद्वानों, शिक्षाविदों और शोधार्थियों ने विस्तार से मंथन किया।
‘महर्षि दयानंद सरस्वती का राष्ट्र चिंतन और स्वतंत्रता आंदोलन की वैचारिक पृष्ठभूमि निर्माण में योगदान’ विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में शाहपुरा विधायक डॉ. लालाराम बैरवा ने विशिष्ट अतिथि के रूप में भाग लिया। उन्होंने शोधार्थियों एवं शिक्षाविदों को संबोधित करते हुए महर्षि दयानंद सरस्वती के राष्ट्रचिंतन को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की आवश्यकता पर जोर दिया।
दयानंद केवल सुधारक नहीं, राष्ट्रचिंतन के अग्रदूत: बैरवा
विधायक डॉ. लालाराम बैरवा ने कहा कि महर्षि दयानंद सरस्वती केवल सामाजिक एवं धार्मिक सुधारक नहीं थे, बल्कि आधुनिक भारत के प्रमुख राष्ट्रचिंतकों में उनका महत्वपूर्ण स्थान है।
उन्होंने कहा कि महर्षि दयानंद ने समाज को अंधविश्वास और कुरीतियों से बाहर निकालने के साथ ही भारतीयों में आत्मसम्मान और राष्ट्र चेतना का भाव जगाया। उनके चिंतन में स्वदेशी, स्वधर्म और स्वराज जैसे विचारों की स्पष्ट झलक मिलती है, जिसने आगे चलकर देश में स्वतंत्रता आंदोलन की वैचारिक पृष्ठभूमि तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
राष्ट्र प्रथम के विचारों पर शोध की जरूरत
डॉ. बैरवा ने शोधार्थियों से कहा कि महर्षि दयानंद के राष्ट्र प्रथम के विचारों को केवल इतिहास के पन्नों तक सीमित रखने के बजाय वर्तमान संदर्भ में भी समझने और उन पर शोध करने की आवश्यकता है।
उन्होंने युवाओं से महर्षि दयानंद के विचारों को पढ़ने, समझने तथा समाज की नई पीढ़ी तक पहुंचाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि राष्ट्र निर्माण के लिए महर्षि दयानंद की वैचारिक विरासत को समझना आज भी प्रासंगिक है।
राष्ट्रीय संगोष्ठी में विद्वानों ने रखा दृष्टिकोण
राष्ट्रीय संगोष्ठी की अध्यक्षता महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय, अजमेर के कुलपति प्रो. सुरेश कुमार अग्रवाल ने की। कार्यक्रम में पूर्व विधायक पुष्कर डॉ. गोपाल बहेती मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित रहे।
इसके अलावा आचार्य अंकित प्रभाकर ने विषय पर अपने विचार रखे। महर्षि दयानंद शोध पीठ की निदेशक प्रोफेसर ऋतु माथुर ने भी महर्षि दयानंद के राष्ट्रचिंतन तथा स्वतंत्रता आंदोलन की वैचारिक पृष्ठभूमि निर्माण में उनके योगदान पर प्रकाश डाला।
संगोष्ठी में विश्वविद्यालय के शिक्षाविदों, शोध विद्यार्थियों और प्रबंधन तंत्र से जुड़े सदस्यों ने भी सहभागिता की। वक्ताओं ने महर्षि दयानंद के विचारों को वर्तमान सामाजिक और राष्ट्रीय परिस्थितियों के संदर्भ में प्रासंगिक बताते हुए उनके व्यापक अध्ययन की आवश्यकता पर बल दिया।
शोधार्थियों के लिए खुला अध्ययन का नया मार्ग
संगोष्ठी का महत्वपूर्ण पक्ष यह रहा कि महर्षि दयानंद सरस्वती के योगदान को केवल धार्मिक एवं सामाजिक सुधार आंदोलनों तक सीमित रखने के बजाय राष्ट्रचिंतन और स्वतंत्रता आंदोलन की वैचारिक पृष्ठभूमि से जोड़कर देखा गया।
इस दृष्टिकोण से शोधार्थियों को महर्षि दयानंद के विचारों के विभिन्न आयामों पर नए सिरे से अध्ययन करने का अवसर मिला। कार्यक्रम के अंत में अतिथियों और सभी सहभागियों का आभार व्यक्त किया गया।
महर्षि दयानंद का संदेश आज भी समाज जागरण, आत्मसम्मान और राष्ट्र निर्माण के संदर्भ में प्रासंगिक माना जाता है। अजमेर में आयोजित इस संगोष्ठी में उनके राष्ट्रचिंतन को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की आवश्यकता पर दिया गया जोर इसी वैचारिक विरासत को वर्तमान संदर्भ से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल रहा।
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Bhilwara, Rajasthan
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