मेरे गोपाला की शादी में झूम-झूम के नाचो रे


शाहपुरा में रुक्मणी मंगल विवाह बना भक्ति का महोत्सव, पंडाल में उमड़ा आनंद का सागर

शाहपुरा।जब पंडाल में “मेरे गोपाला की शादी में झूम-झूम के नाचो रे” की मधुर धुन गूंजी, तो मानो पूरा शाहपुरा वृंदावन बन गया। तालियों की गड़गड़ाहट, जयकारों की गूंज और भक्तों के झूमते कदम३ श्रीमद्भागवत कथा के दौरान रुक्मणी मंगल विवाह महोत्सव ऐसा दृश्य रच गया, जिसे श्रद्धालु जीवनभर याद रखेंगे। ठाकुर श्रीकृष्ण और माता रुक्मणी के पावन विवाह प्रसंग ने श्रद्धा, उल्लास और भक्ति को एक साथ बांध दिया।
कथा के छठे दिन आज मथुरा के कथावाचक पं. अरुणाचार्य महाराज ने जब श्रीकृष्ण-रुक्मणी विवाह की दिव्य कथा सुनाई, तो पंडाल में मौजूद सैकड़ों श्रद्धालु भावविभोर हो उठे। जैसे ही विवाह का मंगल क्षण आया, भक्त झूम-झूमकर नाचने लगे, एक-दूसरे को बधाइयां दीं और “जय श्रीकृष्ण” के जयकारों से वातावरण को भक्तिमय कर दिया।
कथा के दौरान पं. अरुणाचार्य महाराज ने गूढ़ आध्यात्मिक संदेश देते हुए कहा कि “प्रीति में गोपनशीलता अति आवश्यक है।” सच्चा प्रेम दिखावे से नहीं, बल्कि मन की पवित्रता से होता है। उन्होंने धर्मस्थलों में बढ़ती वीआईपी संस्कृति पर तीखा कटाक्ष करते हुए कहा कि पद, प्रतिष्ठा और प्रभाव का मद व्यक्ति को प्रभु से दूर कर देता है। दीनबंधु कृपानिधान भगवान तो सभी भक्तों पर समान कृपा करते हैं, वहां कोई बड़ा छोटा नहीं।
उन्होंने गोपियों का उदाहरण देते हुए बताया कि जब गोपियों के मन में भी श्रीकृष्ण के समीप होने का हल्का-सा अहंकार आया, तब भगवान ने अंतर्ध्यान होकर उनका मद चूर किया। संदेश साफ था भगवत कृपा अहंकार से नहीं, समर्पण से मिलती है।
यमुना तट की रासलीला, गोपियों का वस्त्रहरण, कृष्ण की बाल लीलाएं३ जैसे-जैसे कथा आगे बढ़ी, भजनों की रसधार बहती गई। ढोलक, मंजीरों और भजनों की धुन पर श्रद्धालु मंत्रमुग्ध होकर नाच उठे। पंडाल में ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो स्वयं नंदलाल अपने भक्तों संग रास रचा रहे हों।
कथा का भावुक मोड़ तब आया जब श्रीकृष्ण के मथुरा गमन का प्रसंग सुनाया गया। अक्रूर जी के साथ मथुरा जाते श्रीकृष्ण की कल्पना मात्र से ब्रजवासियों की पीड़ा का वर्णन हुआ तो श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गईं। कथावाचक ने कहा कि उस क्षण केवल ब्रजवासी ही नहीं, पशु-पक्षी और प्रकृति तक उदास हो गई थी।
इसके बाद कंस वध और जरासंध युद्ध का वर्णन होते ही पंडाल “श्रीकृष्ण-बलराम की जय” के गगनभेदी जयकारों से गूंज उठा। भक्ति के साथ वीर रस का अद्भुत संगम देखने को मिला।
विदर्भ नरेश की पुत्री रुक्मणी का श्रीकृष्ण से एकतरफा प्रेम, शिशुपाल से जबरन तय विवाह और फिर भगवान द्वारा रुक्मणी हरण कर विधिवत विवाहकृजैसे ही यह प्रसंग चरम पर पहुंचा, पूरा पंडाल भक्ति-उत्सव में बदल गया। “गोपाला की शादी है३” भजन पर देर तक भक्त झूमते रहे, पुष्पवर्षा हुई और वातावरण पूर्णतः कृष्णमय हो गया।
शाहपुरा में यह कथा केवल धार्मिक आयोजन नहीं रही, बल्कि अध्यात्म, भक्ति और आनंद का जीवंत उत्सव बन गई। रुक्मणी मंगल विवाह महोत्सव ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया कि जब कथा में भक्ति का रस घुल जाए, तो जन-जन का मन नंदलाल के चरणों में स्वतः झुक जाता है।


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