डूंगरी गांव कुटी पर उमड़ा जनसैलाब


डूंगरी बांध के विरोध में विशाल सांकेतिक धरना

हेला-ख्याल के माध्यम से किया बांध का विरोध

सवाई माधोपुर| डूंगरी गांव कुटी पर आज डूंगरी बांध के विरोध में एक विशाल सांकेतिक धरना दिया गया जिसमें पारंपरिक हेला-ख्याल कार्यक्रम के माध्यम से बांध योजना का कठोरता से विरोध गया और सरकार से बांध को रद्द करवाने की सख्त मांग की गई । इस जनआंदोलन में आसपास के कई दर्जन गांवों से हजारों की संख्या में ग्रामीण, किसान, महिलाएं, युवा और बुजुर्ग एकत्रित हुए। लोकसंस्कृति और जनभावनाओं से ओतप्रोत इस कार्यक्रम ने साफ संदेश दिया कि डूंगरी बांध किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं किया जाएगा। इस बारे में कमलेश पटेल डूंगरी ने बताया कि धरना स्थल पर लोकगीतों, हेला-ख्याल, ढोल-नगाड़ों और ओजपूर्ण व्याख्यानों के माध्यम से बांध के दुष्परिणामों को उजागर किया गया। कलाकारों और वक्ताओं ने गीतों में जल, जंगल, जमीन, खेती, पर्यावरण और विस्थापन के सवालों को प्रमुखता से रखा। हर गीत और हर स्वर में सरकार से एक ही मांग गूंजती रही—
“डूंगरी बांध नहीं बनेगा”
ग्रामीणों ने कहा कि यह बांध हजारों बीघा उपजाऊ कृषि भूमि, गांवों की बसावट, पशुपालन, जल स्रोतों और सामाजिक ताने-बाने को नष्ट कर देगा। वक्ताओं ने चेताया कि बांध बनने से कई गांव उजड़ जाएंगे, लोगों को मजबूरन विस्थापन झेलना पड़ेगा और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य अंधकार में चला जाएगा।
कार्यक्रम में वक्ताओं ने यह भी कहा कि सरकार यदि विकास की बात करती है तो वह स्थानीय लोगों की सहमति, पर्यावरण संतुलन और आजीविका सुरक्षा के साथ होनी चाहिए, न कि जनविरोधी परियोजनाओं के माध्यम से। ग्रामीणों ने दो टूक शब्दों में कहा कि
“हम कट जाएंगे, मर जाएंगे, लेकिन डूंगरी बांध नहीं बनने देंगे।”
धरने के दौरान एकजुटता और अनुशासन देखने को मिला। महिलाओं की बड़ी भागीदारी ने आंदोलन को नई ऊर्जा दी। युवाओं ने आंदोलन को आगे बढ़ाने और हर स्तर पर आवाज उठाने का संकल्प लिया।
इस संबंध में डूंगरी निवासी कमलेश पटेल ने जानकारी देते हुए बताया कि यह कार्यक्रम केवल सांकेतिक नहीं, बल्कि आने वाले बड़े आंदोलन की चेतावनी है। यदि सरकार ने समय रहते बांध को निरस्त नहीं किया, तो आंदोलन को और व्यापक और निर्णायक रूप दिया जाएगा।


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