वीरोदय तीर्थ में श्री सिद्धचक्र विधान के दुसरे दिन चढाए 16 अर्घ्य


राजा श्रीपाल के पूर्व जन्मों की प्रेरक कथा सुनाई, माताजी ने बताए आठ गुणों का महत्व

बड़ोदिया, बांसवाड़ा।अरुण जोशी। वागड के सबसे बडे निमार्णाधीन वीरोदय तीर्थ पर अष्टानिका महापर्व तहत आर्यिका सिद्धश्री माताजी, संघश्री माताजी व सवाश्री माताजी के सानिध्य में आयोजित श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान के दुसरे दिन चढाएं 16 अर्घ्य । वीरोदय तीर्थ कमेटी अध्यक्ष मोहनलाल पिंडारमिया व उपाध्यंक्ष राजेश गांधी ने बताया कि तीर्थ पर गुरूवार प्रात:काल विधान के सौधर्म इन्द्र बसंतलाल खोडणिया पुत्र जीतमल खोडणिया परिवार तथा कुबेर इंन्द्र मोहित तलाटी, हेमेन्द्र तलाटी पुत्र रमेश चंद्र तलाटी परिवार ने श्रीजी को पांडुकशिला पर विराजमान कर जलाभिषेक व शांतिधारा की । जिसके उपरांत आर्यिका सिद्धश्री माताजी के सानिध्य में तथा शास्त्री पियुष जैन के निर्देशन में सिद्धो की आराधना कर सौधर्म इन्द्र बसंतलाल खोडणिया परिवार, कुबेर इन्द्र मोहित तलाटी, इन्द्राणी शीतल तलाटी, विधान के यजमान विमल दोसी पुत्र शांतिलाल दोसी,शकुंतला दोसी,निलम दोसी तथा राजा श्रीपाल के रूप में संजीवन दोसी पुत्र कैलाश दोशी परिवार ने भक्ति करते हुए दुसरे दिन 16 अर्घ्य चढाएं । शाम को बडी संख्या में उपस्थित श्रद्धालुओं ने श्री सिद्धचक्र का पाठ करके महाआरती की । इस दौरान उपाध्यक्ष राजेश गांधी, मोहनलाल दोसी,धनपाल जैन रमणलाल दोसी संजय गांधी सुशील घोडा नितेश गांधी के अलावा बडी संख्या में उपस्थित श्रद्धालुओं ने सिद्ध भगवान की भक्ति करने का सौभाग्य प्राप्त किया। उपाध्यक्ष ने बताया कि तीर्थ पर चल रहे विधान में प्रतिदिन विधान के अलग अलग इन्द्र इन्द्राणी आदि पात्रों का चयन कर सिद्धों भगवान की भक्ति की जा रही है। संचालन शास्त्री पियुष जैन ने किया। दोपहर में माताजी ने अष्ट पाहुंड की गाथाओं का अर्थ बताया एवं सभी की जिज्ञासाओं का समाधान किया। त्याग, तप और साधना से ही आत्मा का कल्याण संभव है। इसी भाव को लेकर आयोजित धर्मसभा में आर्यिका सिद्धश्री माताजी ने राजा श्रीपाल के पूर्व जन्मों की प्रेरक कथा का मार्मिक वर्णन किया। प्रवचन के दौरान श्रद्धालुओं को बताया गया कि वर्तमान जन्म में मिलने वाला सुख-दुःख हमारे पूर्व कर्मों का ही परिणाम होता है।
माताजी ने कहा कि राजा श्रीपाल की कथा केवल एक ऐतिहासिक या धार्मिक प्रसंग नहीं, बल्कि कर्म सिद्धांत को समझाने वाली जीवंत प्रेरणा है। पूर्व जन्म में किए गए पुण्य और पाप कर्मों के कारण ही उन्हें अनेक कष्टों का सामना करना पड़ा, किंतु दृढ़ श्रद्धा, संयम और धर्म के प्रति अटूट विश्वास के कारण अंततः उन्हें मान-सम्मान और समृद्धि प्राप्त हुई। कथा के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि विपरीत परिस्थितियों में भी धर्म का मार्ग नहीं छोड़ना चाहिए। प्रवचन के दौरान माताजी ने विशेष रूप से आठ प्रकार के गुणों का उपदेश दिया। उन्होंने बताया कि सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र के साथ क्षमा, मार्दव (विनम्रता), आर्जव (सरलता), सत्य और संयम जैसे गुण जीवन को श्रेष्ठ बनाते हैं। इन गुणों को अपनाकर मनुष्य अपने जीवन को पवित्र और सार्थक बना सकता है। माताजी ने कहा कि क्षमा से हृदय में शांति आती है, विनम्रता से अहंकार दूर होता है, और सत्य के पालन से आत्मबल बढ़ता है। संयम से इंद्रियों पर नियंत्रण होता है, जिससे आत्मा की उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है। उन्होंने श्रद्धालुओं को प्रेरित किया कि वे इन आठ गुणों को अपने दैनिक जीवन में उतारें और परिवार व समाज में सद्भाव का वातावरण निर्मित करें।


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