आचार्य 108 चंद्रगुप्त गुरुदेव के सानिध्य में गणधर वलय विधान सम्पन्न एवं मुखारबिंद से “महावीर कथा” के अंतिम दिवस के शीर्षक “गर्भ कल्याणक” पर धर्मसभा में सभी श्रोता भाव विभोर हुए


कुशलगढ़, बांसवाड़ा।अरुण जोशी। दिगंबर बीस पंथी जैन समाज अध्यक्ष जयंतीलाल सेठ ने बताया कि आचार्य 108 चंद्रगुप्त गुरुदेव के सानिध्य में आज अंतिम दिवस महावीर कथा के वाचन का शीर्षक “गर्भ कल्याणक” पर गुरुदेव के प्रवचन बीस पंथी नोहरे में सम्पन्न हुए। साथ ही गणधर वलय विधान सम्पन्न हुआ।
जिसमें समाज के सभी वर्गों ने बड़े उत्साह से भाग लिया। सर्वप्रथम बीस पंथी आदिनाथ मंदिर जी में प्रातः पंचामृत अभिषेक हुआ तत्पश्चात गुरुदेव के सानिध्य में संपूर्ण समाज ने महावीर कथा का श्रवण किया। महावीर कथा में आज के मुख्य श्रोता एवं पाद प्रक्षालन का लाभ दीपक रवि राजमल दोषी कुशलगढ़ परिवार को प्राप्त हुआ।
गणधर वलय विधान में शोधर्म इंद्र का लाभ गांधी बाबूलाल प्रीतेश परिवार, कुबेर इंद्र का लाभ कोठारी धर्मेंद्र रसिकलाल परिवार ,ईशान इंद्र के लाभ कमल हरिश्चंद्र मेहता परिवार ,महेंद्र इंद्र का लाभ जितेंद्र कोवलिया परिवार, सनत इंद्र का लाभ हरेंद्र ऋषभ मेहता परिवार , चक्रवर्ती का लाभ प्रीतेश भंवरलाल कोठारी परिवार , यज्ञनायक का लाभ पंकज राजमल दोषी परिवार को मिला गुरुदेव ने प्रवचन में महावीर कथा के अंतिम दिवस में विषय “गर्भ कल्याणक” पर बताया कि जब त्रिलोकनाथ प्रभु का जीव माता त्रिशला के पवित्र गर्भ में आया, उस रात्रि माता ने 14 शुभ स्वप्न देखे—सिंह, हाथी, लक्ष्मी, चंद्रमा, सूर्य, कलश आदि। ज्योतिषियों और विद्वानों ने बताया कि यह बालक या तो चक्रवर्ती सम्राट बनेगा या महान तीर्थंकर।
गर्भ कल्याणक का संदेश है कि महान आत्माएं साधारण वातावरण को भी पवित्र बना देती हैं। जिस क्षण महावीर का जीव गर्भ में आया, उस क्षण से ही माता के मन में दिव्य शांति और करुणा का संचार हुआ। वातावरण में सुख, शांति और सात्विकता की अनुभूति होने लगी। गुरुदेव ने बताया कि गर्भ कल्याणक हमें सिखाता है कि जीवन की पवित्रता गर्भ संस्कार से प्रारंभ होती है। यदि विचार पवित्र हों, आहार शुद्ध हो और मन संयमित हो, तो महान व्यक्तित्व का निर्माण होता है। महावीर का गर्भ कल्याणक हमें प्रेरणा देता है कि हम भी अपने जीवन को संस्कारों, अहिंसा और आत्मशुद्धि से महान बनाएं। साथ ही गुरुदेव ने गर्भ पात पर सभी श्रावकों को सही ज्ञान और दिशा दी। गर्भ पात को महा पाप की श्रेणी में रखा जाता है। जैन सिद्धांत अनुसार, गर्भाधान के क्षण में ही जीव का प्रवेश हो जाता है। यह केवल शरीर की रचना नहीं, बल्कि एक आत्मा का नया जन्म है। अतः गर्भ में स्थित जीव को हानि पहुँचाना हिंसा माना गया है।गर्भपात के विषय में हमें केवल भावुक नहीं, बल्कि धार्मिक और नैतिक दृष्टि से भी विचार करना चाहिए। जहाँ जीवन रक्षा संभव हो, वहाँ करुणा, धैर्य और सकारात्मक सोच अपनानी चाहिए। धर्म सभा में सभी श्रावकों ने बड़े ही संगीतमय भक्ति भाव एवं उत्साह के साथ महावीर कथा एवं गणधर वलय विधान में भाग लिया।


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