शाहपुरा में 200 साल पुराना ऐतिहासिक कानजी का कुंड बदहाल, प्रशासनिक अनदेखी से अस्तित्व पर गहराया संकट


जल संरक्षण के दावों के बीच दम तोड़ती धरोहर: कभी राहगीरों की प्यास बुझाता था यह ऐतिहासिक कुंड, अब बना डंपिंग यार्ड

शाहपुरा। मूलचन्द पेसवानी। भीषण गर्मी के इस दौर में जहाँ सरकारें और प्रशासन ‘जल ही जीवन है’ का नारा देते हुए पानी की एक-एक बूंद बचाने की अपील कर रहे हैं, वहीं शाहपुरा की एक अनमोल ऐतिहासिक धरोहर “कानजी का कुंड” सरकारी सिस्टम की उदासीनता के कारण अपने अस्तित्व की अंतिम लड़ाई लड़ रहा है। यह प्राचीन कुंड आज न केवल उपेक्षा का शिकार है, बल्कि नगर पालिका की लापरवाही के चलते धीरे-धीरे कचरे के ढेर यानी डंपिंग यार्ड में तब्दील होता जा रहा है।

200 साल पुराना गौरवशाली इतिहास शाहपुरा जिला मुख्यालय से करीब 3 किलोमीटर दूर ओदी एवं ढाणी के बीड़ के पास स्थित यह कुंड लगभग 200 वर्ष पुराना है। स्थानीय बुजुर्गों की मानें तो एक दौर ऐसा था जब शाहपुरा से फुलिया कला तक का सफर पैदल, साइकिल या बैलगाड़ी से तय करने वाले मुसाफिरों के लिए यह कुंड एकमात्र सहारा था। किसी अज्ञात भामाशाह ने निस्वार्थ भाव से राहगीरों, ग्वालों और पशुपालकों की सुविधा के लिए इस भव्य कुंड का निर्माण करवाया था। उस समय यह न केवल एक जल स्रोत था, बल्कि सामाजिक मेलजोल और परोपकार का एक बड़ा केंद्र भी हुआ करता था।

स्थापत्य कला का अद्भुत नमूना, पर अब जर्जर कानजी का कुंड अपनी विशेष स्थापत्य शैली के लिए जाना जाता है। पत्थरों की मजबूत बनावट, गहरी संरचना और प्राचीन जल संचयन की पारंपरिक तकनीक आज के आधुनिक इंजीनियरों के लिए भी मिसाल है। यह कुंड इस बात का जीवंत प्रमाण है कि हमारे पूर्वज जल संरक्षण को लेकर कितने गंभीर थे। हालांकि, रखरखाव के अभाव में अब इसकी दीवारें जर्जर हो रही हैं और चारों ओर कंटीली झाड़ियों व गंदगी का साम्राज्य फैल गया है।

सरकारी दावों पर खड़े होते सवाल वर्तमान में राजस्थान सरकार मुख्यमंत्री जल स्वावलंबन अभियान (MJSA) के जरिए जल स्रोतों के पुनरुद्धार के बड़े-बड़े दावे कर रही है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर इतने महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक कुंड को अब तक किसी भी सरकारी योजना में शामिल क्यों नहीं किया गया? क्या जल संरक्षण के अभियान केवल कागजी खानापूर्ति और भाषणों तक ही सीमित हैं? स्थानीय निवासियों में इस बात को लेकर गहरा रोष है कि प्रशासन इस धरोहर को बचाने के बजाय इसे नष्ट होते देख रहा है।

कचरा घर में तब्दील होती धरोहर स्थानीय लोगों का आरोप है कि नगर पालिका द्वारा सफाई व्यवस्था पर ध्यान न दिए जाने के कारण कुंड के आसपास गंदगी का अंबार लग गया है। स्थिति इतनी विकट है कि लोग अब यहाँ कचरा फेंकने लगे हैं। भीषण गर्मी में जब मवेशी और पक्षी पानी के लिए दर-दर भटकते हैं, तब इस कुंड की उपयोगिता और अधिक महसूस होती है, लेकिन पानी की जगह यहाँ अब सिर्फ कचरा नजर आता है।

सामाजिक संगठनों और जनप्रतिनिधियों ने उठाई मांग जल संरक्षण के क्षेत्र में सक्रिय जीव दया सेवा समिति इस कुंड को बचाने के लिए लंबे समय से प्रयासरत है। समिति के संयोजक अतू खा कायमखानी ने चेतावनी देते हुए कहा, “यदि समय रहते इस ऐतिहासिक कुंड का जीर्णोद्धार नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियां केवल किताबों में ही इसका नाम पढ़ पाएंगी। यह केवल पानी का स्रोत नहीं, बल्कि शाहपुरा की विरासत है।”

वहीं, पूर्व पार्षद डॉ. मोहम्मद इशाक ने भी कड़ा रुख अपनाते हुए प्रशासन से मांग की है कि मुख्यमंत्री जल स्वावलंबन अभियान के तहत इस कुंड की तत्काल सफाई करवाई जाए। उन्होंने कहा कि ऐतिहासिक धरोहरों को सहेजना केवल जनता की नहीं, बल्कि प्रशासन की भी संवैधानिक जिम्मेदारी है।

पर्यटन की भी है अपार संभावनाएं ग्रामीणों का कहना है कि यदि प्रशासन इस कुंड की सफाई करवाकर इसके आसपास वृक्षारोपण और सौंदर्यकरण करे, तो इसे एक बेहतरीन पिकनिक स्पॉट और ‘जल संरक्षण मॉडल’ के रूप में विकसित किया जा सकता है। यह स्थल न केवल पर्यटन को बढ़ावा देगा, बल्कि भविष्य के जल संकट से लड़ने में भी मददगार साबित होगा। अब देखना यह है कि क्या प्रशासन की नींद खुलती है या यह 200 साल पुरानी धरोहर इतिहास के पन्नों में दफन हो जाएगी।

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