इंटरनेट मीडिया पर फर्जी पत्रकारिता, भ्रामक खबरों और जवाबदेही के अभाव को लेकर विशेषज्ञों ने नियामक व्यवस्था की मांग उठाई।
प्रयागराज। इंटरनेट मीडिया के तेजी से बढ़ते प्रभाव के बीच फर्जी पत्रकारिता और भ्रामक खबरों का मुद्दा लगातार गंभीर होता जा रहा है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और डिजिटल माध्यमों का दुरुपयोग कर स्वयं को पत्रकार बताने वाले लोगों की बढ़ती संख्या को लेकर पत्रकारिता जगत और कानूनी विशेषज्ञों ने चिंता जताई है। इसी बीच दिल्ली हाईकोर्ट की एक हालिया टिप्पणी ने इस विषय को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
जानकारों का कहना है कि प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की तुलना में इंटरनेट मीडिया के क्षेत्र में नियामक व्यवस्था अपेक्षाकृत सीमित होने के कारण कई लोग बिना किसी संस्थागत जवाबदेही के स्वयं को पत्रकार घोषित कर रहे हैं। आरोप है कि कुछ लोग सोशल मीडिया और व्हाट्सएप ग्रुप के माध्यम से अधिकारियों को जोड़कर पत्रकारिता की पहचान का दुरुपयोग कर रहे हैं।
भ्रामक खबरों पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
हाल ही में दिल्ली हाईकोर्ट ने मुख्य न्यायाधीश और अन्य न्यायाधीशों से जुड़ी एक वायरल भ्रामक खबर पर सुनवाई के दौरान कड़ी टिप्पणी की। न्यायालय ने कहा कि इस प्रकार की झूठी और भ्रामक सूचनाएं न्यायपालिका में जनता के विश्वास को प्रभावित करती हैं। अदालत ने संबंधित आपत्तिजनक सामग्री हटाने के निर्देश भी दिए। जांच में वायरल तस्वीरों और दावों को भ्रामक पाया गया।
नियामक व्यवस्था की उठी मांग
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) नियम, 2021 के तहत फर्जी और भ्रामक सामग्री के विरुद्ध कार्रवाई का प्रावधान है। हालांकि, उनका मानना है कि डिजिटल पत्रकारिता के क्षेत्र में जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी नियामक व्यवस्था पर भी गंभीर विचार किए जाने की आवश्यकता है।
वरिष्ठ पत्रकारों ने जताई चिंता
वरिष्ठ पत्रकारों का कहना है कि पत्रकारिता की विश्वसनीयता लोकतंत्र के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। उनका मानना है कि तथ्यहीन और भ्रामक खबरों पर प्रभावी नियंत्रण तथा जिम्मेदार पत्रकारिता को बढ़ावा देना समय की आवश्यकता है, ताकि आम जनता का समाचार माध्यमों पर विश्वास कायम रह सके।
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