गुरुपूर्णिमा विशेष: शाहपुरा से विश्वभर में गूंजा रामनाम, भीलवाड़ा ने दिए रामनिवास धाम को तीन आचार्य


रामनिवास धाम शाहपुरा की गौरवशाली आचार्य परंपरा में भीलवाड़ा की पावन भूमि से तीन संत प्रधान पीठ पर आसीन हुए, गुरुपूर्णिमा पर जानिए रामस्नेही संप्रदाय का स्वर्णिम इतिहास।

शाहपुरा। गुरुपूर्णिमा विशेष के अवसर पर रामस्नेही संप्रदाय की गौरवशाली परंपरा का एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य सामने आता है। राजस्थान की पावन भूमि पर स्थित शाहपुरा का रामनिवास धाम केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि निर्गुण-निराकार रामभक्ति का वह आध्यात्मिक केंद्र है, जहां से रामनाम की ऐसी अखंड ज्योति प्रज्वलित हुई जिसने देश ही नहीं, बल्कि विश्वभर में करोड़ों श्रद्धालुओं को रामभक्ति से जोड़ दिया।

रामनिवास धाम की आचार्य परंपरा का अध्ययन यह गौरवपूर्ण तथ्य सामने लाता है कि प्रधान पीठ पर विराजमान आचार्यों में भीलवाड़ा जिले की धरती से तीन संतों ने सर्वोच्च आचार्य पद को सुशोभित किया। यह उपलब्धि न केवल भीलवाड़ा बल्कि सम्पूर्ण रामस्नेही समाज के लिए गर्व का विषय है।

रामानंद परंपरा से शुरू हुई रामस्नेही धारा

रामस्नेही संप्रदाय की आध्यात्मिक परंपरा संत शिरोमणि स्वामी रामानंदाचार्य से जुड़ती है। उनके शिष्य संत अनंतानंद, कृष्णदास, संतदास और कृपारामजी महाराज के माध्यम से यह गुरु-शिष्य परंपरा आगे बढ़ी। इसी परंपरा की दसवीं पीढ़ी में आद्याचार्य महाप्रभु स्वामी रामचरणजी महाराज का अवतरण हुआ, जिन्होंने वर्ष 1760 में रामस्नेही संप्रदाय की स्थापना कर रामनाम, सेवा, समता, वैराग्य और निर्गुण भक्ति का संदेश जन-जन तक पहुंचाया।

शाहपुरा बना रामनाम की राजधानी

वर्ष 1769 में तत्कालीन शाहपुरा राजपरिवार के आमंत्रण पर स्वामी रामचरणजी महाराज शाहपुरा पहुंचे और यहां रामनिवास धाम की स्थापना हुई। यही स्थान आगे चलकर अंतरराष्ट्रीय रामस्नेही संप्रदाय की प्रधान पीठ बना।

अप्रैल 1798 में स्वामी रामचरणजी महाराज के ब्रह्मलीन होने तक देशभर में लगभग 1600 रामद्वारे स्थापित हो चुके थे तथा करीब 250 संत रामनाम का प्रचार-प्रसार कर रहे थे। यह उस समय किसी भी संत परंपरा के लिए असाधारण उपलब्धि मानी जाती है।

वाणी बनी संप्रदाय का अमर ग्रंथ

स्वामी रामचरणजी महाराज के उपदेशों और आध्यात्मिक संदेशों को उनके शिष्यों ने संकलित किया, जो आज ‘वाणी’ के रूप में रामस्नेही संप्रदाय का प्रमुख ग्रंथ है। इसमें रामनाम को मुक्ति का सर्वोत्तम साधन तथा गुरु को जीवन का प्रकाश स्तंभ बताया गया है। संप्रदाय में मूर्तिपूजा की अपेक्षा निर्गुण-निराकार राम की साधना, सेवा, सादगी और समता को विशेष महत्व दिया गया।

चार प्रमुख धामों से गूंजती है रामभक्ति

रामस्नेही परंपरा में शाहपुरा, सोड़ा, कुहाड़ा (भीलवाड़ा) और बनवाड़ा को प्रमुख आध्यात्मिक केंद्र माना जाता है। इन चारों धामों से आज भी रामनाम की वही परंपरा निरंतर प्रवाहित हो रही है।

भीलवाड़ा की धरती ने दिए तीन आचार्य

वर्तमान पीठाधीश्वर जगतगुरु स्वामी रामदयालजी महाराज के अनुसार रामनिवास धाम की आचार्य परंपरा में भीलवाड़ा जिले की पावन भूमि से तीन संतों ने प्रधान पीठ का नेतृत्व किया। इस तथ्य की पुष्टि संप्रदाय के इतिहासकार ब्रजेंद्र कुमार सिंघल द्वारा संपादित ‘आचार्य परंपरा’ ग्रंथ तथा वरिष्ठ संत गुरुमुखरामजी महाराज द्वारा भी की गई है।

प्रथम आचार्य स्वामी रामजनजी महाराज

महाप्रभु स्वामी रामचरणजी महाराज के ब्रह्मलीन होने के बाद सरसिया चारणान (भीलवाड़ा) निवासी स्वामी रामजनजी महाराज प्रधान पीठ के प्रथम उत्तराधिकारी बने। उन्होंने लगभग 12 वर्षों तक संप्रदाय का नेतृत्व कर संगठन को मजबूत आधार प्रदान किया।

छठे आचार्य स्वामी हरिदासजी महाराज

आगूचा (भीलवाड़ा) में जन्मे स्वामी हरिदासजी महाराज रामस्नेही इतिहास के छठे आचार्य बने। उनके कार्यकाल में संप्रदाय की अनुशासन परंपरा और आध्यात्मिक व्यवस्था को नई मजबूती मिली।

आठवें आचार्य स्वामी दिलशुद्धरामजी महाराज

अभयपुर (भीलवाड़ा) में जन्मे स्वामी दिलशुद्धरामजी महाराज रामनिवास धाम के आठवें आचार्य बने। उनके नेतृत्व में रामनाम के प्रचार और संप्रदाय के विस्तार को नई गति मिली।

विश्वभर में फैला रामस्नेही संप्रदाय

चौदहवें आचार्य स्वामी रामकिशोरजी महाराज के काल में रामस्नेही संप्रदाय ने राष्ट्रीय सीमाओं से आगे बढ़कर अंतरराष्ट्रीय पहचान बनाई। वर्तमान में पंद्रहवें पीठाधीश्वर जगतगुरु स्वामी रामदयालजी महाराज के नेतृत्व में संप्रदाय सेवा, संस्कार, समरसता और आध्यात्मिक जागरण के नए आयाम स्थापित कर रहा है।

गुरुपूर्णिमा का संदेश

गुरुपूर्णिमा केवल गुरु वंदना का पर्व नहीं, बल्कि गुरु परंपरा, आध्यात्मिक संस्कार और भारतीय संस्कृति के संरक्षण का भी संदेश देती है। शाहपुरा स्थित रामनिवास धाम से निकली रामनाम की यह अमर ज्योति आज भी विश्वभर के लाखों श्रद्धालुओं के जीवन को आलोकित कर रही है। वहीं भीलवाड़ा की धरती से तीन-तीन आचार्यों का प्रधान पीठ पर विराजमान होना इस गौरवशाली परंपरा का स्वर्णिम अध्याय है।

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