सच भी पक्षपाती होता है, सच बोलने के पीछे छिपा होता है एजेंडा


आधा सच, खबरों की टाइमिंग और निजी हितों का खेल समझना जरूरी, पाठकों के लिए सवाल कि कौन बोल रहा है और क्या छिपा रहा है

प्रयागराज। हम बचपन से सुनते आए हैं कि “सदा सच बोलो, सच की जीत होती है।” स्कूलों की दीवारों पर भी “सत्यमेव जयते” लिखा दिखाई देता था। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आज के दौर में सच भी पक्षपाती हो सकता है? यह विचार कड़वा जरूर है, लेकिन मीडिया, राजनीति और सार्वजनिक संवाद के मौजूदा माहौल में इस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।

आज कई बार सच बोलना भी एक एजेंडा बन जाता है। सवाल केवल यह नहीं रह जाता कि कोई बात सही है या गलत, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि उसे किस उद्देश्य से, किस समय और किस तरह प्रस्तुत किया जा रहा है। किसी खबर में तथ्य सही हो सकते हैं, लेकिन उन तथ्यों को चुनने और बाकी बातों को छिपाने के पीछे किसी का निजी हित भी हो सकता है।

सच को आधा बोलकर परोसा जाता है बड़ा झूठ

मान लीजिए विकास कार्यों के नाम पर 10 करोड़ रुपये का घोटाला हुआ। कोई पत्रकार खबर लिखता है कि नेता जी ने करोड़ों रुपये खा लिए। तकनीकी रूप से यह बात सही हो सकती है कि घोटाले में 10 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ, लेकिन यदि खबर में केवल एक करोड़ रुपये का उल्लेख किया जाए और बाकी नौ करोड़ रुपये से जुड़े लोगों या तथ्यों को जानबूझकर छिपा दिया जाए, तो यह अधूरा सच होगा।

ऐसा क्यों किया जाता है? इसके पीछे किसी का निजी हित, विज्ञापन, संबंध या अन्य स्वार्थ हो सकता है। जब खबर में कुछ लोगों के नाम उजागर किए जाते हैं और कुछ को बचा लिया जाता है, तब पाठक के सामने पूरी तस्वीर नहीं पहुंचती।

आधा सच कई बार पूरे झूठ से भी ज्यादा खतरनाक हो सकता है, क्योंकि वह सही तथ्यों का सहारा लेकर पाठक को अधूरी जानकारी के आधार पर निष्कर्ष निकालने के लिए प्रेरित करता है।

सच बोलने का समय भी तय करता है उसका एजेंडा

किसी पत्रकार के पास एक खबर की जानकारी छह महीने से मौजूद है, लेकिन वह उसे प्रकाशित नहीं करता। अचानक चुनाव का समय आता है और वही खबर रातों-रात ब्रेकिंग न्यूज बनकर सामने आ जाती है।

ऐसी स्थिति में सवाल केवल खबर के सच या झूठ का नहीं है। यदि खबर सही है, तो यह भी जानना जरूरी है कि उसे छह महीने तक क्यों दबाकर रखा गया और चुनाव के समय ही सार्वजनिक करने की जरूरत क्यों महसूस हुई?

क्या उस खबर को पहले प्रकाशित करने में कोई बाधा थी? क्या अब उसके सामने आने से किसी का राजनीतिक या व्यावसायिक हित पूरा हो रहा है? क्या खबर की टाइमिंग के पीछे कोई विशेष उद्देश्य है?

इस तरह खबर का समय भी उसके उद्देश्य को समझने का महत्वपूर्ण आधार बन जाता है। सच कब सामने लाया गया, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि सच क्या है।

हर सच के पीछे कोई न कोई हित छिपा हो सकता है

आज हर व्यक्ति यह दावा करता दिखाई देता है कि वह निडर है, सच बोलता है और किसी से नहीं डरता। लेकिन यह पूछना भी जरूरी है कि उसकी इस निडरता से उसे क्या हासिल हो रहा है?

किसी को यूट्यूब पर लाखों व्यूज और उनसे कमाई मिल रही है। किसी को फंडिंग का लाभ मिल रहा है। किसी को राजनीतिक दल से टिकट की उम्मीद है। कोई अपने पुराने कारनामों पर पर्दा डालने के लिए दूसरे की गलतियां उजागर कर रहा है, तो किसी का उद्देश्य अपना अखबार या चैनल चलाना और उसकी बिक्री बढ़ाना हो सकता है।

इसका अर्थ यह नहीं कि हर पत्रकार, लेखक या सच बोलने वाला व्यक्ति किसी स्वार्थ से प्रेरित होता है। लेकिन किसी भी दावे को परखते समय उसके पीछे मौजूद संभावित हितों पर ध्यान देना जरूरी है।

कई बार रोटी, नोट, वोट या किसी से बदला लेने की भावना सच की प्रस्तुति को प्रभावित कर सकती है। यही कारण है कि सच की सफेद चादर के पीछे छिपे उद्देश्य को समझना आसान नहीं होता।

सबसे खतरनाक होता है सच जैसा दिखाई देने वाला पक्षपात

झूठ को पकड़ना कई बार आसान होता है, लेकिन आधे सच और चुनिंदा तथ्यों के जरिए बनाई गई धारणा को पहचानना मुश्किल हो सकता है।

उदाहरण के तौर पर यदि किसी खबर में कहा जाए कि किसी विशेष जाति के लोगों ने दंगा किया, तो यह एक तथ्य हो सकता है। लेकिन यदि यह नहीं बताया गया कि दंगा शुरू कैसे हुआ और उससे पहले क्या घटनाएं हुई थीं, तो पाठक के सामने अधूरी तस्वीर रखी जा रही है। ऐसी प्रस्तुति जातिगत पूर्वाग्रह को बढ़ावा दे सकती है।

इसी तरह यदि कहा जाए कि किसी धर्म के लोगों ने पत्थर फेंके, लेकिन उससे पहले हुई घटनाओं और पूरे घटनाक्रम का उल्लेख न किया जाए, तो खबर सांप्रदायिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देने का माध्यम बन सकती है।

राजनीति में भी यही तरीका दिखाई दे सकता है। यदि कोई कहता है कि वर्तमान सरकार ने इतना कर्ज लिया, लेकिन पिछली सरकार के कार्यकाल में लिए गए कर्ज की जानकारी नहीं देता, तो तुलना अधूरी रह जाती है। इस तरह सही आंकड़े भी राजनीतिक एजेंडे के लिए इस्तेमाल किए जा सकते हैं।

आज तथ्यों को चुनकर, काट-छांटकर और अपने हित के अनुसार प्रस्तुत करना जनमत को प्रभावित करने का एक तरीका बन सकता है।

आम पाठक को क्या करना चाहिए?

आज के समय में केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि किसी खबर में क्या कहा जा रहा है। पाठक को यह भी समझने की कोशिश करनी चाहिए कि खबर कौन प्रस्तुत कर रहा है, उसे किस समय सामने लाया जा रहा है और उसके पीछे क्या उद्देश्य हो सकता है।

किसी भी खबर या दावे को समझने के लिए कुछ सवाल महत्वपूर्ण हैं—

  • खबर किसने प्रकाशित की है और उसका स्रोत क्या है?
  • क्या खबर में सभी जरूरी तथ्य शामिल किए गए हैं?
  • क्या किसी महत्वपूर्ण जानकारी या दूसरे पक्ष को छिपाया गया है?
  • खबर सामने लाने का समय क्या किसी विशेष परिस्थिति से जुड़ा है?
  • क्या उसी घटना पर दूसरे विश्वसनीय स्रोतों में भी जानकारी उपलब्ध है?
  • क्या खबर तथ्य प्रस्तुत कर रही है या पाठक को किसी खास निष्कर्ष तक पहुंचाने की कोशिश कर रही है?

इन सवालों के जवाब तलाशने से पाठक किसी भी खबर को अधिक समझदारी से परख सकता है। किसी एक खबर या एक स्रोत के आधार पर राय बनाने के बजाय अलग-अलग स्रोतों से जानकारी जुटाना भी जरूरी है।

सच बोलने से पहले सच के पीछे का उद्देश्य समझना जरूरी

जिस दिन पाठक किसी खबर के पीछे मौजूद हितों और उसके प्रस्तुत करने के तरीके को समझने लगेगा, उस दिन वह सच के नाम पर परोसे जाने वाले एजेंडे का हिस्सा बनने से बच सकेगा।

याद रखिए, हर खबर को केवल इसलिए सच नहीं मान लेना चाहिए क्योंकि उसे बड़े आत्मविश्वास से प्रस्तुत किया गया है। उसी तरह हर आलोचना को झूठ या हर असहमति को एजेंडा भी नहीं कहा जा सकता। जरूरी है कि तथ्यों की जांच हो, संदर्भ पूरा हो और निष्कर्ष प्रमाणों के आधार पर निकाला जाए।

सच बोलना अच्छी बात है, लेकिन सच को पूरी ईमानदारी और पूरे संदर्भ के साथ समझना उससे भी बड़ी जिम्मेदारी है। पत्रकारिता का उद्देश्य केवल किसी के पक्ष या विपक्ष में माहौल बनाना नहीं, बल्कि जनता तक पूरी और निष्पक्ष जानकारी पहुंचाना होना चाहिए।

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