गुलाम भारत में खजाना लूटने पर फांसी, आजाद भारत में कुर्सी


काकोरी कांड के क्रांतिकारियों के बलिदान से आज के भ्रष्टाचार पर उठते सवाल, सरकारी खजाने की कथित लूट और जवाबदेही के मुद्दे पर तीखा व्यंग्य

प्रयागराज। गुलाम भारत में सरकारी खजाना लूटने पर क्रांतिकारियों को फांसी हुई, लेकिन आजाद भारत में विकास के नाम पर सरकारी धन के दुरुपयोग और बंदरबांट के आरोपों के बीच कई लोग सत्ता की कुर्सियों पर बैठे दिखाई देते हैं। यह विरोधाभास लोकतंत्र, व्यवस्था और जनता के धन की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है।

काकोरी कांड के क्रांतिकारियों ने देश की आजादी के लिए उठाया था कदम

9 अगस्त 1925 का दिन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में काकोरी कांड के नाम से दर्ज है। उस समय भारत अंग्रेजी हुकूमत की गुलामी में जकड़ा हुआ था। रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां, राजेंद्र लाहिड़ी और ठाकुर रोशन सिंह जैसे क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी सरकार के खजाने को निशाना बनाया था।

इन क्रांतिकारियों का उद्देश्य अपनी निजी तिजोरियां भरना नहीं, बल्कि अंग्रेजी शासन के खिलाफ आजादी की लड़ाई को मजबूत करना था। क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए हथियार और अन्य संसाधन जुटाने के उद्देश्य से सरकारी खजाने को लूटा गया था।

इसके बाद अंग्रेजी हुकूमत ने इस घटना को गंभीर अपराध मानते हुए कड़ी कार्रवाई की। काकोरी कांड के मामले में रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां, राजेंद्र लाहिड़ी और ठाकुर रोशन सिंह सहित चार प्रमुख क्रांतिकारियों को फांसी की सजा दी गई। देश की आजादी के लिए अपना जीवन न्योछावर करने वाले ये क्रांतिकारी आज भी इतिहास में अमर शहीदों के रूप में याद किए जाते हैं।

आजाद भारत में खजाना लूटने का तरीका बदलने का आरोप

अब तस्वीर आजाद भारत की है। आज सरकारी खजाने तक पहुंचने के लिए न ट्रेन रोकने की जरूरत है और न ही हथियार उठाने की। भ्रष्टाचार पर व्यंग्य करते हुए सवाल उठाया जा रहा है कि अब एक दस्तखत, एक टेंडर, एक कमीशन या एक फाइल के जरिए भी सरकारी धन के दुरुपयोग का रास्ता बन सकता है।

सड़क, नल, स्कूल, अस्पताल, खाद, बीज और गरीबों के अनाज जैसी जनकल्याणकारी योजनाओं के नाम पर खर्च होने वाले धन को लेकर अक्सर सवाल उठते हैं। आरोपों और शिकायतों में कहीं सड़क का निर्माण कागजों में पूरा दिखाया जाता है, लेकिन जमीन पर कीचड़ नजर आता है। कहीं नल लगने का दावा होता है, लेकिन टोंटी से पानी नहीं आता। कहीं अस्पतालों में दवाइयों की उपलब्धता के दावे किए जाते हैं, जबकि मरीजों को परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

ऐसे उदाहरणों के जरिए व्यवस्था पर सवाल उठता है कि जनता के टैक्स से जमा होने वाले सरकारी धन का वास्तविक लाभ आम नागरिकों तक क्यों नहीं पहुंच पाता? यदि विकास कार्यों में भ्रष्टाचार या धन की हेराफेरी होती है, तो उसकी जिम्मेदारी तय करने और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करने में देरी क्यों होती है?

तब क्रांतिकारियों को सजा, आज भ्रष्टाचार पर जवाबदेही की मांग

इस तीखे व्यंग्य में गुलाम भारत और आजाद भारत की व्यवस्था के बीच अंतर को सामने रखा गया है।

गुलाम भारत के क्रांतिकारी: अंग्रेजी खजाने को लूटा, देश की आजादी के उद्देश्य से संघर्ष किया, जेल गए और फांसी पर चढ़े। इतिहास ने उन्हें शहीदों के रूप में सम्मान दिया।

आजाद भारत में भ्रष्टाचार के आरोपी: सरकारी धन के दुरुपयोग के आरोपों के बावजूद कई मामलों में जांच, मुकदमे और न्यायिक प्रक्रिया लंबी चलती रहती है। इस दौरान राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था में जवाबदेही को लेकर सवाल उठते रहते हैं।

तब अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष करने वालों को काल कोठरी और फांसी का सामना करना पड़ा। आज भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे प्रभावशाली लोगों को लेकर जनता के मन में सवाल उठते हैं कि जांच और न्याय की प्रक्रिया इतनी लंबी क्यों हो जाती है? क्या कानून का प्रभाव सभी पर समान रूप से दिखाई देता है?

अदालतों में लंबी सुनवाई और न्याय में देरी पर सवाल

भ्रष्टाचार से जुड़े कई मामलों में जांच और न्यायिक प्रक्रिया लंबी चलने की शिकायतें सामने आती रहती हैं। वर्षों तक मुकदमों का लंबित रहना और तारीख पर तारीख पड़ना आम नागरिकों के मन में न्याय व्यवस्था को लेकर निराशा पैदा कर सकता है।

सवाल यह है कि जनता के धन से जुड़े मामलों में जांच कितनी पारदर्शी होनी चाहिए? दोष साबित होने पर कार्रवाई कितनी तेजी से होनी चाहिए? और जिन लोगों पर सार्वजनिक धन के दुरुपयोग के आरोप लगते हैं, उनकी जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए व्यवस्था कितनी प्रभावी है?

राजनीति में ईमानदारी के भाषण देने वाले नेताओं और जनप्रतिनिधियों से भी जनता यही अपेक्षा करती है कि वे सरकारी धन के उपयोग में पारदर्शिता रखें और भ्रष्टाचार के मामलों में निष्पक्ष कार्रवाई का समर्थन करें।

अगर आज बिस्मिल और अशफाक लौट आएं तो क्या कहेंगे?

कभी-कभी यह कल्पना मन में आती है कि अगर रामप्रसाद बिस्मिल और अशफाक उल्ला खां आज वापस लौटें और उस देश की हालत देखें, जिसके लिए उन्होंने हंसते-हंसते फांसी का फंदा चूमा था, तो उनकी प्रतिक्रिया क्या होगी?

शायद वे यही सवाल पूछें कि जिस देश को विदेशी लुटेरों से बचाने के लिए हमने अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया, आज उसी देश की जनता के धन की रक्षा कौन कर रहा है? जिस आजादी के लिए हमने संघर्ष किया, क्या उस आजादी का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंच रहा है?

उनकी कुर्बानी हमें याद दिलाती है कि आजादी केवल सत्ता हासिल करने का नाम नहीं है। आजादी का वास्तविक अर्थ है जनता के अधिकारों की रक्षा, ईमानदार व्यवस्था और देश के संसाधनों का सही उपयोग।

फैसला जनता को करना है

तब खजाना लूटने के पीछे आजादी की लड़ाई का उद्देश्य था, जिसकी कीमत क्रांतिकारियों ने अपनी जान देकर चुकाई। आज सरकारी धन के दुरुपयोग और भ्रष्टाचार के आरोपों पर जनता जवाबदेही और निष्पक्ष कार्रवाई की मांग करती है।

यह व्यंग्य सत्ता और व्यवस्था से एक सीधा सवाल पूछता है कि जनता के खजाने की रक्षा कौन करेगा? क्या सरकारी धन का दुरुपयोग करने वालों पर समय रहते कार्रवाई होगी? क्या दोषियों को उनके पद और प्रभाव से ऊपर उठकर कानून के दायरे में लाया जाएगा?

आखिरकार फैसला जनता को करना है कि उसे देश के संसाधनों की रक्षा करने वाले जनप्रतिनिधि चाहिए या जनता के धन की जवाबदेही से बचने वाले लोग। उसे शहीदों के आदर्शों पर चलने वाली राजनीति चाहिए या सत्ता के लिए राजनीति करने वाले चेहरे।

फोकस की बात यही है कि सरकारी खजाना जनता की अमानत है और उसकी रक्षा करना हर जिम्मेदार जनप्रतिनिधि तथा अधिकारी का कर्तव्य है।

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