आर्यिका संघ का बडोदिया से कलिंजरा के लिए हुआ विहार


पाश्चात्य संस्कृति छोड़कर धार्मिक संस्कार अपनाने की जरूरत : आर्यिका सिद्धश्री माताजी

बड़ोदिया, बांसवाड़ा।अरुण जोशी। बदलती जीवनशैली और पाश्चात्य संस्कृति के बढ़ते प्रभाव के बीच नई पीढ़ी को भारतीय धार्मिक संस्कारों से जोड़ना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। बच्चों में अच्छे संस्कार और नैतिक मूल्यों का विकास धार्मिक पाठशालाओं के माध्यम से ही संभव है। यह बात आचार्य श्री विभव सागरजी महाराज की परम शिष्या आर्यिका सिद्धश्री माताजी ने श्री आदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर बड़ोदिया में आयोजित धर्मसभा में कही। आर्यिका ने अपने प्रवचन में कहा कि यदि समाज को आने वाली पीढ़ी को सही दिशा देनी है तो धार्मिक शिक्षा को प्राथमिकता देनी होगी । उन्होंने कहा कि आज के समय में बच्चों और युवाओं का झुकाव तेजी से पाश्चात्य संस्कृति की ओर बढ़ रहा है, जिससे भारतीय संस्कृति और परंपराएं धीरे-धीरे कमजोर होती जा रही हैं। ऐसे में धार्मिक पाठशालाओं का नियमित संचालन समाज के लिए अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि धार्मिक पाठशाला केवल शिक्षा का केंद्र नहीं बल्कि संस्कार निर्माण की पाठशाला होती है। यहां बच्चों को धर्म नैतिकता अनुशासन संयम और संस्कृति की शिक्षा मिलती है। यही संस्कार आगे चलकर उनके व्यक्तित्व और जीवन का आधार बनते हैं। यदि बचपन से ही बच्चों में अच्छे संस्कार पड़ जाएं तो वे जीवन में सही मार्ग पर चलते हैं और समाज के लिए भी आदर्श बनते हैं।
आर्यिका सिद्धश्री माताजी ने कहा कि आज का युवा वर्ग पाश्चात्य संस्कृति की चमक-दमक से प्रभावित होकर अपनी पारंपरिक जीवनशैली को भूलता जा रहा है। पहले जहां घरों में सात्विक और पारंपरिक भोजन का महत्व था, वहीं अब उसकी जगह फास्ट फूड ने ले ली है । उन्होंने कहा कि फास्ट फूड केवल शरीर को ही नहीं बल्कि मानसिक क्षमता को भी कमजोर करता है । इसका सीधा असर बच्चों के स्वास्थ्य और उनके संस्कारों पर पड़ता है। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में सादा जीवन और उच्च विचार की परंपरा रही है। हमारे ऋषि-मुनियों ने संयम, त्याग और साधना का मार्ग दिखाया है। यदि समाज इन मूल्यों को अपनाए तो जीवन में शांति, संतुलन और सद्भाव बना रह सकता है। इसके विपरीत पाश्चात्य संस्कृति का अंधानुकरण व्यक्ति को भौतिकता की ओर ले जाता है, जिससे जीवन में अशांति और असंतुलन बढ़ता है।
आर्यिका ने कहा कि माता-पिता की भी जिम्मेदारी है कि वे अपने बच्चों को धर्म और संस्कृति से जोड़ें । यदि घर से ही बच्चों को धार्मिक वातावरण मिलेगा तो वे स्वाभाविक रूप से अच्छे संस्कार ग्रहण करेंगे। उन्होंने कहा कि बच्चों को मंदिर, पाठशाला और धार्मिक कार्यक्रमों से जोड़ना चाहिए ताकि उनमें धर्म के प्रति आस्था और संस्कार विकसित हो सकें।
उन्होंने समाजजनों से आह्वान करते हुए कहा कि सभी मिलकर धार्मिक पाठशालाओं को मजबूत बनाएं और अधिक से अधिक बच्चों को इससे जोड़ें । जब बच्चे धर्म, संस्कार और संस्कृति के मार्ग पर चलेंगे तभी समाज और राष्ट्र का भविष्य उज्ज्वल बनेगा। रविवार सांय आर्यिका सिद्धश्री माताजी का बडोदिया से कलिंजरा के विहार हुआ। विहार में बडी संख्या में बालिकाएं व महिलाएं शामील हुई तथा भक्ति करते हुए संघ का विहार कराया।


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