ईमानदारी अपराध बन जाए तो लोकतंत्र आईसीयू में है: राजदेव द्विवेदी


व्यवस्था में ईमानदारों की उपेक्षा, चाटुकारिता और राजनीतिक संरक्षण पर सवाल, सुधारों के साथ जनभागीदारी की जरूरत पर जोर

प्रयागराज। राजदेव द्विवेदी। लोकतंत्र की मजबूती के लिए ईमानदारी, निष्ठा, पारदर्शिता और जनभागीदारी को महत्वपूर्ण माना जाता है। हालांकि, मौजूदा व्यवस्था को लेकर यह सवाल उठाया जा रहा है कि क्या आज सच बोलना जोखिम और ईमानदार रहना नुकसान का कारण बनता जा रहा है? जब किसी व्यवस्था में नियमों का पालन करने वाले कर्मचारियों, जमीनी स्तर पर काम करने वाले राजनीतिक कार्यकर्ताओं और नैतिकता की बात करने वाले आम नागरिकों को उपेक्षा का सामना करना पड़े, तो लोकतांत्रिक मूल्यों और व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर चर्चा जरूरी हो जाती है।

“जब ईमानदारी अपराध बन जाए, तो समझो लोकतंत्र आईसीयू में है!” यह विचार व्यवस्था में ईमानदार लोगों की स्थिति, चाटुकारिता के बढ़ते प्रभाव और लोकतांत्रिक संस्थाओं में सुधार की आवश्यकता पर केंद्रित है। इसमें समाज, शासन और जनप्रतिनिधियों की भूमिका को लेकर सवाल उठाए गए हैं। साथ ही, यह तर्क रखा गया है कि यदि ईमानदार लोगों को लगातार हतोत्साहित किया गया, तो आने वाली पीढ़ियों के सामने ईमानदारी और सार्वजनिक जीवन को लेकर गंभीर संकट खड़ा हो सकता है।

सिस्टम का नंगा सच: ईमानदार को सजा, चाटुकार को ताज!

लोकतंत्र के तीन प्रमुख आधारों के रूप में समाज, शासन और जनप्रतिनिधियों का उल्लेख करते हुए व्यवस्था में आई विकृतियों पर सवाल उठाए गए हैं। विचार के अनुसार, जो लोग तंत्र को मजबूत बनाने में अपनी भूमिका निभाते हैं, उन्हीं के सामने कई बार उपेक्षा, तिरस्कार और प्रतिकूल परिस्थितियों की समस्या खड़ी हो जाती है।

दफ्तर में नियमों की पहरेदारी करने वाला निष्ठावान कर्मचारी हो, धूप-धूल में काम करने वाला जमीनी राजनीतिक कार्यकर्ता हो या नैतिकता की अलख जगाने वाला आम नागरिक—इन सभी की भूमिका लोकतांत्रिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण मानी जाती है। लेकिन इस विचार में चिंता जताई गई है कि इन लोगों को सम्मान और प्रोत्साहन मिलने के बजाय कई बार उपेक्षा, तिरस्कार और तबादले जैसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है।

इसमें कहा गया है कि “रीढ़ वालों को तोड़ो, तलवे चाटने वालों को जोड़ो” जैसी प्रवृत्ति व्यवस्था के प्रति लोगों के विश्वास को प्रभावित कर सकती है। विचार का मूल प्रश्न यही है कि यदि निष्ठा, कर्तव्य और ईमानदारी को महत्व नहीं मिलेगा, तो व्यवस्था में विश्वास और जवाबदेही कैसे मजबूत होगी?

निष्ठा नहीं, जी-हुजूरी है नया पैमाना

व्यवस्था को लेकर व्यक्त किए गए विचार में यह आरोप लगाया गया है कि कई जगहों पर योग्यता और कर्तव्यनिष्ठा के बजाय अंध-वफादारी को महत्व मिलने लगा है। इसमें कहा गया है कि ईमानदार अधिकारी जब किसी गलत फाइल पर हस्ताक्षर करने से इनकार करता है, तो उसके निर्णय को कर्तव्यनिष्ठा के रूप में स्वीकार करने के बजाय उसे ‘अड़ंगेबाज’ बताया जा सकता है।

विचार के अनुसार, ऐसे अधिकारियों को कठिन या प्रतिकूल पोस्टिंग का सामना करना पड़ सकता है। वहीं, उन लोगों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिलने की आलोचना की गई है, जो गलत कार्यों पर आंखें मूंद लेना जानते हैं। इस संदर्भ में यह सवाल उठाया गया है कि यदि नियमों का पालन करने वाले अधिकारियों को ही परेशानी का सामना करना पड़े, तो व्यवस्था में ईमानदारी को प्रोत्साहन कैसे मिलेगा?

यह विचार केवल अधिकारियों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सरकारी कार्यालयों की कार्यप्रणाली, निर्णय लेने की प्रक्रिया और जिम्मेदारी तय करने के तरीके पर भी सवाल उठाए गए हैं। इसमें यह चिंता व्यक्त की गई है कि यदि कर्तव्यनिष्ठा को बाधा समझा जाने लगे, तो संस्थागत जवाबदेही कमजोर हो सकती है।

जमीनी राजनीतिक कार्यकर्ताओं की उपेक्षा पर सवाल

राजनीतिक क्षेत्र की स्थिति को लेकर भी इस विचार में सवाल उठाए गए हैं। इसमें कहा गया है कि कई जमीनी कार्यकर्ता दशकों तक पार्टी के लिए काम करते हैं। वे झंडा उठाते हैं, संघर्षों में भाग लेते हैं, कठिन परिस्थितियों का सामना करते हैं और संगठन को मजबूत बनाने में योगदान देते हैं।

हालांकि, विचार के अनुसार चुनाव के समय ऐसे कार्यकर्ताओं की भूमिका को कई बार नजरअंदाज कर दिया जाता है। टिकट और पद के बंटवारे में धनबल, बाहुबल और बाहर से आने वाले नेताओं के प्रभाव को लेकर चिंता जताई गई है। इसमें यह सवाल उठाया गया है कि यदि लंबे समय तक संगठन के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं को अवसर नहीं मिलेंगे, तो वे राजनीति में सक्रिय रहने के लिए प्रेरित कैसे होंगे?

इस विचार में राजनीतिक दलों के भीतर आंतरिक लोकतंत्र, पारदर्शिता और जमीनी कार्यकर्ताओं की भागीदारी को लेकर सुधार की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। साथ ही, टिकट वितरण और संगठनात्मक जिम्मेदारियों में योग्यता, निष्ठा और सार्वजनिक आचरण को महत्व देने की बात कही गई है।

समाज में सफलता का पैमाना बदलने की जरूरत

समाज की भूमिका पर सवाल उठाते हुए विचार में कहा गया है कि मंचों से ईमानदारी की बातें करने वाला समाज कई बार व्यवहार में ऐसे लोगों को सफल मान लेता है, जिनके पास सत्ता, प्रभाव, धन या तिकड़म का सहारा होता है।

इसमें यह चिंता व्यक्त की गई है कि सादगी को बेबसी का पर्याय बना दिया गया है। यदि किसी व्यक्ति की ईमानदारी, सादगी और नैतिकता को उसकी कमजोरी समझा जाने लगे, तो सामाजिक मूल्यों पर प्रश्न खड़े होते हैं।

विचार के अनुसार, समाज को अपने व्यवहार और प्राथमिकताओं पर आत्ममंथन करना चाहिए। केवल भाषणों में ईमानदारी की प्रशंसा करने के बजाय, सार्वजनिक जीवन में ईमानदार और जिम्मेदार आचरण को वास्तविक सम्मान मिलना चाहिए। इसमें यह भी कहा गया है कि सामाजिक प्रतिष्ठा का आधार केवल धन, पद या प्रभाव नहीं होना चाहिए।

ईमानदार युवाओं के सामने खड़े हो रहे सवाल

इस विचार में आने वाली पीढ़ी के सामने खड़े होने वाले सवालों को भी प्रमुखता से उठाया गया है। इसमें पूछा गया है कि कोई युवा ईमानदार अधिकारी क्यों बनना चाहेगा, यदि उसे लगे कि ईमानदारी के बदले उसे आरोप, जांच और तबादले जैसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है?

इसी तरह, कोई कर्मठ युवा समाज सेवा या सार्वजनिक जीवन में क्यों आएगा, यदि उसकी बात सुनने के बजाय केवल चापलूसों को महत्व दिया जाएगा? विचार में कहा गया है कि ऐसी परिस्थितियां युवाओं के उत्साह और सार्वजनिक संस्थाओं के प्रति उनके विश्वास को प्रभावित कर सकती हैं।

इसमें चेतावनी दी गई है कि यदि ईमानदार लोगों को लगातार व्यवस्था से दूर किया जाता रहा, तो भविष्य में बेईमानी को ही एकमात्र विकल्प मानने की प्रवृत्ति बढ़ सकती है। इसलिए नैतिकता पर केवल उपदेश देने के बजाय व्यवस्था में ऐसे बदलाव करने की जरूरत बताई गई है, जिनसे ईमानदार आचरण को सुरक्षा और सम्मान मिल सके।

व्यवस्था में सुधार के लिए जरूरी कदम

विचार में व्यवस्था की कमियों को दूर करने के लिए कई सुझाव प्रस्तुत किए गए हैं। इसमें कहा गया है कि खोखली नैतिक नसीहतों से काम नहीं चलेगा, बल्कि संस्थागत स्तर पर ठोस सुधारों की आवश्यकता है।

तबादला बोर्ड और व्हिसलब्लोअर कवच

इसमें सुझाव दिया गया है कि तबादलों के लिए स्वतंत्र बोर्ड का गठन किया जाए। विचार में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप तबादला व्यवस्था में सुधार और ईमानदार कर्मचारियों को राजनीतिक प्रतिशोध से कानूनी सुरक्षा देने की मांग की गई है।

इसके साथ ही, व्हिसलब्लोअर कानून को प्रभावी तरीके से लागू करने की बात कही गई है, ताकि भ्रष्टाचार या अनियमितताओं की जानकारी सामने लाने वाले लोगों को सुरक्षा मिल सके। विचार के अनुसार, कानून केवल कागजों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उसका वास्तविक लाभ उन लोगों तक पहुंचना चाहिए, जो गलत कार्यों के खिलाफ आवाज उठाते हैं।

राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र का ऑडिट

राजनीतिक दलों के भीतर आंतरिक लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए ऑडिट की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया है। विचार में सुझाव दिया गया है कि चुनाव आयोग राजनीतिक दलों को टिकट वितरण और संगठन में जमीनी, निष्कलंक कार्यकर्ताओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए बाध्य करे।

इसमें 50 प्रतिशत हिस्सेदारी जमीनी कार्यकर्ताओं की रखने का प्रस्ताव रखा गया है। साथ ही, दलों में ऐसे लोगों के प्रभाव को सीमित करने की बात कही गई है, जो केवल धनबल या बाहरी प्रभाव के आधार पर अवसर हासिल करते हैं।

विचार में ‘आयाराम-गयाराम’ की राजनीति और धनपतियों के प्रभाव पर भी लगाम लगाने की जरूरत बताई गई है। इसका उद्देश्य राजनीतिक दलों में निष्ठा, संगठनात्मक योगदान और आंतरिक भागीदारी को महत्व देने की दिशा में सुधार करना है।

फाइलों का डिजिटल ट्रेल और पारदर्शिता

प्रशासनिक कार्यप्रणाली में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए फाइलों और नोटशीट का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार करने का सुझाव दिया गया है। विचार में कहा गया है कि हर फाइल और हर नोटशीट का डिजिटल ट्रेल इस प्रकार बनाया जाना चाहिए कि निर्णय लेने की प्रक्रिया स्पष्ट रहे।

इसमें यह भी प्रस्ताव रखा गया है कि राजनीतिक दबाव से संबंधित फोन, पर्चियों या अन्य निर्देशों का रिकॉर्ड सार्वजनिक निगरानी के दायरे में लाने की व्यवस्था हो। विचार के अनुसार, ऐसी पारदर्शी व्यवस्था से प्रशासनिक निर्णयों की जवाबदेही तय करने में मदद मिल सकती है।

मतदाताओं को भी करना होगा आत्ममंथन

विचार में मतदाताओं की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया गया है। इसमें कहा गया है कि जब तक मतदाता केवल रुतबे, धन और प्रभाव को देखकर मतदान करेंगे, तब तक सच्चे जनप्रतिनिधित्व की अपेक्षा पूरी करना कठिन हो सकता है।

इसमें मतदाताओं से अपील की गई है कि वे अपने निर्णयों में उम्मीदवारों के सार्वजनिक आचरण, ईमानदारी, जवाबदेही और जनहित से जुड़े कार्यों को भी महत्व दें। विचार के अनुसार, लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए केवल राजनीतिक दलों और जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी पर्याप्त नहीं है, बल्कि नागरिकों की सजग भागीदारी भी आवश्यक है।

ईमानदार लोगों को निर्णायक भागीदारी देने की मांग

विचार के अंत में शासन और व्यवस्था से जुड़े लोगों को संबोधित करते हुए कहा गया है कि चाटुकारिता के सहारे खड़ी व्यवस्था लंबे समय तक मजबूत नहीं रह सकती। इसमें यह तर्क रखा गया है कि यदि व्यवस्था में ईमानदार लोगों को लगातार हाशिए पर रखा गया, तो उसका असर संस्थाओं और जनता के विश्वास पर पड़ सकता है।

इसमें ईमानदार लोगों को केवल सहानुभूति नहीं, बल्कि सत्ता और निर्णय प्रक्रिया में निर्णायक हिस्सेदारी देने की मांग की गई है। विचार के अनुसार, देश और लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए ईमानदार अधिकारियों, जमीनी कार्यकर्ताओं और जिम्मेदार नागरिकों को सम्मान, सुरक्षा और अवसर देना जरूरी है।

इस पूरे विचार का केंद्रीय संदेश यही है कि लोकतंत्र की मजबूती केवल चुनावों तक सीमित नहीं है। इसके लिए शासन में पारदर्शिता, राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र, समाज में नैतिक मूल्यों का सम्मान और नागरिकों की जागरूक भागीदारी भी आवश्यक है। यदि ईमानदारी को व्यवस्था में वास्तविक स्थान मिलेगा, तभी सार्वजनिक जीवन में विश्वास और जवाबदेही को मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ा जा सकेगा।

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