प्रकृति की समृद्धि के बिना, खेती और किसान का समृद्ध होना नामुमकिन
कुशलगढ़| प्रभात ग्राम राखो में महादेव चोक पर भूमि सुपोषण कार्यक्रम का आयोजन किया गया के मुख्य वक्ता बाँसवाड़ा विभाग के सह विभाग ग्राम सह सयोंजक गोपाल पाटीदार ने बताया कि धरती माता को सुपोषित जैविक पद्दति अपनाकर ही कर सकते हैं हमारा अपना जीवन अति भौतिकतावादी युग मे पशुपालन व जैविक खेती के प्रति उदासीनता के कारण कृषि क्षेत्र में हास हो रहा हैं और हमारी खेती का जीवन दोनों प्रकृति के वैभव पर निर्भर है। आप जिस भूमि पर फसल उगाते हैं, वह भूमि हमें और आपको, अपने पूर्वजों से विरासत में मिली है। आज से लगभग 50 साल पहले भूमि में जीवांश कार्बन की औसत मात्रा 0.52% थी । भूमि के नीचे 40 से 50 फुट पर भू-गर्भ जल उपलब्ध था । गांव की जैव- विविधता भी संपन्न थी। हमारे पूर्वज अपनी भूमि में अपने परिवार की आवश्यकता के अनुसार खेती करते थे। किसान अपनी फसलों को उगाने के लिये रासायनिक उर्वरक व दवाईयों प्रयोग नही करते थे। फसलों में कीट एवं रोगों का प्रकोप भी बहुत कम होता था। इसका एक ही कारण था, कि हमारी भूमि में जीवांश कार्बन पर्याप्त मात्रा में था। जैव- विविधता में नाना प्रकार की जीव- जंतु सभी पारिस्थितिकी संतुलन पर्याप्त मात्रा में थे। हरित क्रांति कार्यक्रम के अंतर्गत सिंचाई साधनों को बढ़ावा दिया गया। भूमि में रासायनिक खाद व दवाइयों के प्रयोग से भूमि पोषक तत्वों की कमी व पोषक तत्वों का असंतुलन के कारण अनेक असाध्य रोग हो रहे है शस्य विधियों पर बहुत से शोध कार्य किए गए। फसलों को पर्याप्त पोषण के लिए रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग को बढ़ावा दिया गया, साथ ही खेती में मशीनीकरण को भी बढ़ावा दिया गया। आगे चलकर फसलों पर लगने वाले कीट, रोग एवं खरपतवारों से बचाने के लिए फसल सुरक्षा रसायनों का प्रयोग किया जाने लगा। हमने बहुत विकास किया, परंतु उस विकास के पीछे होने वाले विनाश को हमने नहीं देखा। रसायन आधारित फसल उत्पादन प्रणाली अपनाकर जहां देश खाद्यान्न उत्पादन में आत नहीं है। आकाश में विचरण करने वाले नभचर नहीं हैं। भूमि में रहने वाले हमारे मित्र केंचुआ और अन्य लाभदायक सूक्ष्म जीव भी विलुप्त हो चुके हैं।विलुप्त होती जा रही हैं। आज देश की कृषि नीतियां किसानों की आय को बढ़ाने के प्रयास में लगी हैं, परंतु प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण एवं जैव- विविधता के संवर्धन के बिना यह संभव नहीं है। आज देश के किसान भाइयों को अपनी खेती योग्य भूमियों की उर्वरता को बढ़ाने और भू-गर्भ जल का दोहन रोकने के लिए परंपरागत कृषि उत्पादन प्रणाली की ओर लौटने की ज़रूरत है। क्योंकि पिछले 20 वर्षों का इतिहास गवाह है, कि फसलों की उत्पादकता में ठहराव आ गया है। फसलों की उत्पादन लागत निरंतर बढ़ रही है ।भोजन में स्वाद नहीं बचा है। और रसायन युक्त भोजन, पानी , हवा के सेवन से हम बीमार हो रहे हैं। इन सब का एक ही कारण है, कि हमारी धरती की उर्वरता निरंतर घटती जा रही है ।भू-गर्भ जलस्तर प्रत्येक वर्ष नीचे जा रहा है। ज़मीन पर रहने वाले थलचर , जलाशयों में रहने वाले जलचर और नभ में विचरण करने वाले नभचर समाप्त होते जा रहे हैं । इसी वजह से फसलों की उत्पादन लागत निरंतर बढ़ रही है। किसान को उपज का सही मूल्य भी नहीं मिल पा रहा है। देश का अधिकांश किसान कर्ज में डूबा हुआ है। इन सब समस्याओं से बाहर आने के लिए आज हमें ज़रूरत हैं जलसंरक्षण हेतु पानी को खेत में रोकने के लिए अपने खेतों की मेड़ों को मज़बूत करें। खेत की मेड़ों पर अपनी रुचि के अनुसार बृक्षारोपण करना हैं खेती करने के साथ-साथ किसान भाई गौ आधारित खेती अवश्य करें। पशुओं के मल मूत्र और फसलों के अवशेष को कच्चे गड्ढे में जैविक खाद बनाई जाए, ताकि रसायनिक उर्वरकों पर बढ़ती निर्भरता को कम किया जा सके और भूमि में जीवांश कार्बन की मात्रा को बढ़ाया जा सके। पुराने तालाबों का जीर्णोद्वार करें। किसान भाइयों को फसल उत्पादन के साथ-साथ पशुपालन का काम भी करना चाहिए, क्योंकि घर में पाले गए पशु फसल अवशेष खाकर हमें खाद और दूध उपलब्ध कराते हैं। इसके साथ -साथ किसान भाई अपने खेतों में गोबर की खाद, हरी खाद, नेडफ खाद,वर्मी खाद और जीवामृत जैविक खादों का भी प्रयोग करें। फसल चक्र में मोटे अनाज वाली फसलों का समावेश करते हुए फसल चक्र अपना कर अपने खेतों में अपने परिवार की आवश्यकताओं के अनुसार फसलों की बुवाई करें। ध्यान रहे, मिट्टी की उर्वरता को बढ़ाएं बिना, भू-गर्भ जल स्तर को ऊपर उठाए बिना और जैव- विविधता के संवर्धन के बिना, फसलों की उत्पादन लागत को कम नहीं किया जा सकता। और ना ही प्रति इकाई क्षेत्रफल से अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता। रसायन आधारित खेती से अपना ध्यान हटाकर प्राकृतिक खेती करने की तरफ ध्यान दें । भूमि और भूमि में फैली जैव- विविधता की समृद्धि के बिना, खेती और किसान का समृद्ध होना नामुमकिन है जिला ग्राम सयोंजक ने बताया कि राखो गाँव के प्रत्येक किसानों द्वारा अपने खेतो से मिट्टी लेकर धरती माता का सुपोषण करने हेतु पूजन व गौ माता का पूजन किया गया जिसमें गौतम बारोड लालाराम यादव वक्ता भाई बुनकर गोविंद डामोर वेलजी पाटीदार रमेश जोशी गुमानेग बारोड व महिलाएं व पुरुष व ग्राम विकास समिति के सदस्य, किसान संघ के कार्यकर्ता उपस्थित थे ।