सिद्धचक्र महामंडल विधान से होती है कर्म निर्जरा, मुनि निंदा से बचने का दिया संदेश


श्री सिद्धचक्र विधान के चौथे दिन श्रद्धालुओं ने चढाएं 64 अर्घ्ये

सम्यक दर्शन के आठ अंगों के पालन और देव-शास्त्र-गुरु के प्रति अटूट श्रद्धा रखने का आह्वान

बडोदिया, बांसवाड़ा।अरुण जोशी। वागड के सबसे बडे वीरोदय तीर्थ पर अष्टानिका महापर्व पर आचार्य श्री विभव सागरजी महाराज की परम शिष्या आर्यिका सिद्धश्री माताजी, संघश्री माताजी व सवाश्री माताजी ससंघ के सानिध्य व शास्त्री पियुष जैन के निर्देशन में आयोजित श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान के चौथे दिन श्रद्धालुओं ने चढाएं 64 अर्घ्य। । वीरोदय तीर्थ कमेटी उपाध्यक्ष राजेश गांधी व रमणलाल दोसी ने बताया कि तीर्थ पर शनिवार प्रात: श्रीजी का जलाभिषेक व शांतिधारा का धर्मलाभ बडी संख्या में पहुंचे श्रद्धालुओं ने लिया । जिसके उपरांत पांडुकशिला पर श्रीजी विराजमान कर विधान में आज के सौधर्म इन्द्र केसरीमल जैन पुत्र मिठालाल जैन परिवार बांसवाडा,विधान के यजमान कांतिलाल खोडणिया पुत्र सुखलाल खोडणिया परिवार बडोदिया,कुबेर इन्द्र मोहनलाल दोसी पुत्र मिठालाल दोसी व राजा श्रीपाल के रूप में सुशील घोडा पुत्र रतनलाल घोडा इन सभी इन्द्र् इन्द्राणी परिवार व श्रद्धालुओं ने श्री सिद्धचक्र महामंडल की पूजन कर विधान के महामंडल में 64 अर्घ्य चढाएं । अष्टान्हिका महापर्व के तहत पांचवा उपवास कर रही सुषमा गांधी धर्मपत्नी संजय गांधी ने आर्यिका संघ को श्रीफल भेंट कर आशीर्वाद लिया । संचालन शास्त्री पियुष जैन ने किया । इस दौरान उपाध्यक्ष धनपाल लालावत, कांतिलाल खोडणिया बडोदिया,केसरीमल जैन, मोहनलाल दोसी, रमणलाल दोसी, संजय गांधी, नितेश गांधी के अलावा बडी संख्या में उपस्थित श्रद्धालुओं ने सिद्ध भगवान की भक्ति करने का सौभाग्य प्राप्त किया । उपाध्यक्ष ने बताया कि तीर्थ पर श्रद्धालु जलाभिषेक, पूजन व विधान की आरती एवं आर्यिका संघ को आहार देने का सौभाग्य प्रतिदिन प्राप्त कर रहे है वही शाम को श्री सिद्धचक्र मंडल विधान का पाठ व आरती की जा रही है ।
प्रत्येद जीव अपने कर्म बंधन में बंधा हुआ है।आर्यिका सिद्धश्री माताजी ने कहा कि इस संसार में नाना प्रकार के जीव हैं और प्रत्येक जीव अपने-अपने कर्मों के बंधन में बंधा हुआ है। जीव द्वारा किए गए शुभ और अशुभ कर्म ही उसके सुख-दुख का कारण बनते हैं। इसलिए मन, वचन और काया से सदैव संयमित और सतर्क रहना आवश्यक है। विशेष रूप से मुनिराजों की निंदा को अत्यंत घातक बताया गया। कहा गया कि मुनि निंदा करने से गंभीर पाप बंध होता है, जिसका परिणाम भविष्य में दुःखदायी रोगों और कष्टों के रूप में सामने आ सकता है।
प्रवचन में सम्यक दर्शन के आठ अंगों का सम्यक रूप से पालन करने पर विशेष बल दिया गया। बताया गया कि सम्यक दर्शन आत्मा की शुद्धि का आधार है। यदि श्रद्धा शुद्ध होगी तो आचरण भी शुद्ध होगा। सम्यक दर्शन के अंगों में शंका, कांक्षा, चिकित्सा मिथ्यात्व आदि दोषों से दूर रहना आवश्यक है।श्रद्धालुओं को प्रेरित किया गया कि वे सिद्धों के समान मुनिराजों को भी उतनी ही श्रद्धा से नमस्कार करें, क्योंकि वे मोक्षमार्ग के साक्षात पथप्रदर्शक होते हैं। धर्मसभा में आर्यिका ने कहा कि पंथवाद और संतवाद जैसी संकीर्ण मानसिकताओं से ऊपर उठना समय की आवश्यकता है। जब तक व्यक्ति संप्रदाय, मत और विचारों के विवादों में उलझा रहेगा, तब तक उसकी आत्मा का कल्याण संभव नहीं है। इसलिए सभी को देव, शास्त्र और गुरु के प्रति अटूट श्रद्धा बनाए रखते हुए समभाव से धर्म साधना करनी चाहिए। यही सच्चे धर्म का स्वरूप है। विशेष रूप से सिद्धचक्र महामंडल विधान की महिमा का वर्णन करते हुए बताया गया कि यह विधान आत्मशुद्धि और कर्म निर्जरा का महान साधन है। सिद्धचक्र विधान के माध्यम से श्रद्धालु अपने पूर्व में किए गए पापकर्मों की आत्मालोचना करते हैं और प्रायश्चित लेकर आत्मा को निर्मल बनाने का प्रयास करते हैं। मुनियों के प्रति यदि कभी अनादर या निंदाजनक भाव उत्पन्न हुए हों, तो इस विधान के माध्यम से उनका प्रायश्चित कर आत्मिक शांति प्राप्त की जा सकती है। उन्होंने कहा कि केवल बाह्य पूजा पर्याप्त नहीं है, बल्कि अंतर्मन की शुद्धि आवश्यक है। जब तक भीतर से दोषों का परित्याग नहीं होगा, तब तक सच्ची साधना पूर्ण नहीं मानी जाएगी। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को चरित्रवान ज्ञानवान और श्रद्धावान बनने का प्रयास करना चाहिए। चरित्र की दृढ़ता, ज्ञान की पवित्रता और श्रद्धा की स्थिरता ही जीवन को सार्थक बनाती है।


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