दशहरे पर भगवान नरसिंह मंदिर से शुरू हुई परंपरा, घर-घर जाकर ग्रामीणों ने किया अभिवादन और हथाई पर बैठकर गांव की समस्याओं पर की चर्चा
बौंली। सवाई माधोपुर जिले के उपखंड बौंली की ग्राम पंचायत लाखनपुर में दशहरे के अवसर पर सदियों पुरानी ‘राम-राम सा’ परंपरा श्रद्धा, उत्साह और सामाजिक सद्भाव के साथ निभाई गई। मंगलवार शाम 8 बजे भगवान नरसिंह जी के मंदिर से जयकारों के साथ इस पारंपरिक कार्यक्रम की शुरुआत हुई। इस दौरान ग्रामीणों ने एक-दूसरे के घर जाकर राम-राम किया और आपसी बैर-भाव तथा द्वेष भुलाकर गले मिले। गांव में निभाई जाने वाली यह परंपरा सामाजिक एकता, आपसी प्रेम और भाईचारे का संदेश देती है।
होली और दशहरे पर निभाई जाती है सदियों पुरानी परंपरा
लाखनपुर गांव में ‘राम-राम सा’ कार्यक्रम साल में दो बार होली और दशहरे के अवसर पर आयोजित किया जाता है। इस परंपरा के तहत गांव के लोग आपसी मनमुटाव, बैर-भाव और द्वेष को भुलाकर एक-दूसरे से मिलते हैं। ग्रामीण एक-दूसरे के घर पहुंचकर राम-राम करते हैं और आपसी संबंधों को मजबूत बनाते हैं।
इस अवसर पर गांव के लोग सभी मंदिरों में जाकर ढोक लगाते हैं और भगवान को प्रणाम करते हैं। धार्मिक आस्था के साथ निभाई जाने वाली इस परंपरा में पूरे गांव की भागीदारी देखने को मिलती है। देर रात तक गांव की गलियों और घरों में ‘राम-राम सा’ की आवाज गूंजती रहती है।
एक-दूसरे के घर जाकर दो बार राम-राम करने की अनूठी परंपरा
लाखनपुर की ‘राम-राम सा’ परंपरा की सबसे खास बात यह है कि इसमें एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से दो बार राम-राम करता है। पहली बार एक व्यक्ति दूसरे के घर जाकर अभिवादन करता है। इस दौरान परिवार के सदस्य घर के द्वार पर हाथ जोड़कर खड़े रहते हैं और आने वाले व्यक्ति का स्वागत करते हैं।
इसके बाद दूसरा व्यक्ति भी पहले व्यक्ति के घर पहुंचकर राम-राम करता है। इस तरह दोनों परिवार एक-दूसरे के घर जाकर पारंपरिक तरीके से अभिवादन करते हैं। यह परंपरा केवल औपचारिक मुलाकात तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्रामीणों के बीच आपसी प्रेम, सम्मान और सामाजिक जुड़ाव को मजबूत करने का माध्यम भी है।
हथाई पर बैठकर गांव की समस्याओं पर होती है चर्चा
राम-राम सा कार्यक्रम के दौरान आपसी मेल-मिलाप के साथ गांव के विकास और जनसमस्याओं पर चर्चा करने की परंपरा भी निभाई जाती है। सभी ग्रामीण एकत्र होकर हथाई पर बैठते हैं, जहां गांव की प्रमुख समस्याओं पर विचार-विमर्श किया जाता है। इसके साथ ही समस्याओं के समाधान के लिए आपसी बातचीत के माध्यम से प्रयास किए जाते हैं।
इस प्रकार यह आयोजन धार्मिक और सामाजिक महत्व के साथ ग्रामीण स्तर पर संवाद तथा सामूहिक सहभागिता का अवसर भी प्रदान करता है। ग्रामीण एक-दूसरे से मिलकर गांव से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करते हैं और आपसी सहयोग की भावना को आगे बढ़ाते हैं।
बचपन से देखते आ रहे हैं ग्रामीण, परंपरा की शुरुआत के बारे में किसी को जानकारी नहीं
गांव के सेवानिवृत्त प्राचार्य शंभुदयाल शर्मा, मुकेश जांगिड़, श्रीराम गुर्जर, जगराम माली, देवीसिंह राठौड़ और सेवानिवृत्त अध्यापक प्यारचंद जैन ने बताया कि गांव में किसी को भी इस बात की निश्चित जानकारी नहीं है कि ‘राम-राम सा’ परंपरा की शुरुआत कब हुई थी। उन्होंने कहा कि वे भी बचपन से ही गांव में इस परंपरा को इसी तरह निभाते हुए देखते आ रहे हैं।
ग्रामीणों के अनुसार, यह कार्यक्रम गांव की सामाजिक, धार्मिक और पारंपरिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसकी खासियत यह है कि आधुनिक युग के दिखावे से दूर इसे पूरी सादगी के साथ मनाया जाता है। ग्रामीणों के बीच आपसी सद्भाव बनाए रखने और पुराने संबंधों को मजबूत करने में इस परंपरा की महत्वपूर्ण भूमिका है।
कार्यक्रम को दुर्गाशंकर मिश्र, शिवराज हर्षाना और सियाराम मीणा ने किया संबोधित
‘राम-राम सा’ कार्यक्रम के दौरान दुर्गाशंकर मिश्र, शिवराज हर्षाना और प्रशासक सियाराम मीणा ने ग्रामीणों को संबोधित किया। कार्यक्रम में परंपरा के सामाजिक महत्व और गांव में आपसी मेल-मिलाप की भावना को बनाए रखने से जुड़े संदेश दिए गए।
सरपंच चुनाव नजदीक होने से इस बार अधिक भीड़ रही
इस बार गांव में सरपंच चुनाव नजदीक होने के कारण ‘राम-राम सा’ कार्यक्रम में अधिक भीड़ देखने को मिली। कार्यक्रम में सभी सरपंच प्रत्याशी भी नजर आए। दशहरे के अवसर पर आयोजित इस पारंपरिक आयोजन में ग्रामीणों की भागीदारी के साथ चुनावी माहौल की झलक भी देखने को मिली।
लाखनपुर की यह सदियों पुरानी परंपरा आज भी ग्रामीण जीवन में आपसी भाईचारे, धार्मिक आस्था और सामाजिक एकता को बनाए रखने का माध्यम बनी हुई है। घर-घर जाकर राम-राम करने और हथाई पर बैठकर गांव की समस्याओं पर चर्चा करने की यह परंपरा ग्रामीण संस्कृति की विशिष्ट पहचान को दर्शाती है।
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Sawai Madhopur, Rajasthan
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