ग्राम सभाओं की पारदर्शिता, जवाबदेही और जनभागीदारी पर उठे सवाल, समाजसेवी अमित तिवारी ने पंचायतीराज व्यवस्था पर रखे अपने विचार।
प्रयागराज | पंचायतीराज व्यवस्था को लेकर समाज में लगातार चर्चा होती रही है। इसी विषय पर समाजसेवी अमित कुमार तिवारी ने अपने विचार साझा करते हुए कहा कि गांवों में लोकतंत्र को मजबूत बनाने के उद्देश्य से लागू की गई पंचायतीराज व्यवस्था ने विकास के नए रास्ते जरूर खोले हैं, लेकिन इसके साथ ही कई स्थानों पर चुनावी रंजिश और सामाजिक विभाजन भी बढ़ा है।
उन्होंने कहा कि पहले गांवों में खेत की मेड़, पानी या पारिवारिक विवादों को लेकर मतभेद होते थे, लेकिन अब पंचायत चुनाव के बाद गांवों में “प्रधान का आदमी”, “पूर्व प्रधान का आदमी”, “समर्थक” और “विरोधी” जैसी नई पहचान बन गई है। इससे सामाजिक सौहार्द प्रभावित हुआ है।
गांवों में विकास के साथ जवाबदेही भी जरूरी
अमित तिवारी ने कहा कि पंचायतों के माध्यम से गांवों में सड़कें बनीं, नालियां बनीं, पेयजल योजनाएं पहुंचीं, आवास योजनाओं का लाभ मिला और महिलाओं तथा वंचित वर्गों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व भी मिला। यह पंचायतीराज व्यवस्था की महत्वपूर्ण उपलब्धियां हैं।
हालांकि उन्होंने सवाल उठाया कि ग्राम सभा की पिछली बैठक कब हुई, गांव में विकास कार्यों के लिए कितना बजट आया और उसका कितना उपयोग हुआ, इसकी जानकारी कितने ग्रामीणों को है? यदि आम नागरिक पंचायत के खर्च और निर्णयों से अनभिज्ञ हैं तो पंचायत व्यवस्था की पारदर्शिता पर गंभीर चर्चा होना आवश्यक है।
ग्रामसभा बने वास्तविक सरकार
उन्होंने स्पष्ट कहा कि पंचायतों को समाप्त करना समाधान नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि पंचायत केवल प्रधान या सरपंच की सत्ता बनकर न रह जाए, बल्कि ग्रामसभा वास्तव में गांव की सरकार बने।
उन्होंने शासन और प्रशासन से सवाल करते हुए कहा कि क्या अब समय नहीं आ गया है कि पंचायतों के प्रत्येक खर्च का सार्वजनिक डिजिटल प्रदर्शन अनिवार्य किया जाए और ग्रामसभा की बैठकों का सत्यापित रिकॉर्ड भी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराया जाए।
73वें संविधान संशोधन का मूल उद्देश्य
अमित तिवारी ने कहा कि भारतीय लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण अवधारणाओं में से एक यह थी कि गांव अपने विकास से जुड़े निर्णय स्वयं लें। इसी सोच के तहत 73वें संविधान संशोधन के माध्यम से पंचायतीराज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा दिया गया।
इस व्यवस्था का मूल उद्देश्य सत्ता का विकेंद्रीकरण, जनभागीदारी और स्थानीय स्वशासन को मजबूत करना था। लेकिन तीन दशक बाद यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या पंचायतें वास्तव में गांव की सरकार बन सकीं या केवल सरकारी धन और स्थानीय सत्ता का केंद्र बनकर रह गईं।
चुनाव के साथ बढ़ी सामाजिक रंजिश
उन्होंने कहा कि अनेक गांवों में पंचायत चुनाव अब केवल लोकतांत्रिक प्रक्रिया नहीं रह गए हैं। कई स्थानों पर जातीय गोलबंदी, परिवारों के बीच विभाजन और पुराने विवादों का राजनीतिक रूप देखने को मिलता है। पंचायत चुनावों से जुड़ी हिंसक घटनाएं भी समय-समय पर सामने आती रही हैं। स्थानीय सत्ता और सरकारी धन पर नियंत्रण की प्रतिस्पर्धा ने चुनावों को प्रभाव की लड़ाई बना दिया है।
उपलब्धियां भी कम नहीं
समाजसेवी अमित तिवारी ने यह भी स्वीकार किया कि पंचायतीराज व्यवस्था के माध्यम से गांवों में सड़क, नाली, पेयजल, आवास, शौचालय और रोजगार जैसी योजनाओं का विस्तार हुआ है। महिलाओं, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य वंचित वर्गों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिला है। डिजिटल व्यवस्था और सरकारी योजनाओं के माध्यम से स्थानीय शासन व्यवस्था में भी बदलाव आया है।
रिपोर्टों में भी सामने आई चुनौतियां
उन्होंने बताया कि पंचायतीराज मंत्रालय की वर्ष 2024-25 की रिपोर्ट के अनुसार देशभर में पंचायत संस्थाओं का व्यापक ढांचा तैयार हो चुका है, लेकिन ग्रामसभाओं में आम लोगों की भागीदारी अभी भी चिंता का विषय बनी हुई है।
इसके अलावा 2024 Devolution Index की रिपोर्ट में भी यह उल्लेख किया गया है कि अधिकांश राज्यों में पंचायतों को कार्य, वित्त और कार्मिक संबंधी अधिकार पूरी तरह हस्तांतरित नहीं किए गए हैं।
क्या हो सकते हैं समाधान?
अमित तिवारी ने पंचायत व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने के लिए कई सुझाव दिए। उन्होंने कहा कि ग्रामसभा की नियमित और सत्यापित बैठकें अनिवार्य की जाएं। पंचायत के प्रत्येक खर्च का सार्वजनिक डिजिटल प्रदर्शन हो। सामाजिक अंकेक्षण को मजबूत और अनिवार्य बनाया जाए। गांव स्तर पर गैर-दलीय नागरिक निगरानी समिति गठित की जाए। पंचायत प्रतिनिधियों का नियमित प्रशिक्षण कराया जाए तथा भ्रष्टाचार के मामलों में त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित करते हुए जवाबदेही तय की जाए।
उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की कमियों का समाधान लोकतंत्र को कमजोर करना नहीं बल्कि उसे अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और सहभागी बनाना है।
अंत में उन्होंने कहा कि पंचायतीराज व्यवस्था का महत्व आज भी पूरी तरह कायम है, लेकिन इसके लिए पंचायत को केवल प्रधान की सत्ता नहीं बल्कि ग्रामसभा की सरकार बनाना होगा। गांव का वास्तविक विकास तभी माना जाएगा जब वहां सड़क और विकास कार्यों के साथ-साथ सामाजिक विश्वास, पारदर्शिता और आपसी सौहार्द भी मजबूत हो।
यह भी पढ़ें:

Prayagraj, Ouuta Pradesh
Aawaz Aapki News WhatsApp चैनल से जुड़ें:
सबसे तेज़ और ताज़ा खबरें सीधे अपने व्हाट्सएप पर पाएं।