रामलीला को मनोरंजन नहीं, संस्कार और भक्ति की पाठशाला बताते हुए संवादों की मर्यादा बनाए रखने तथा मंचन से पहले स्क्रिप्ट की जांच करने की अपील
प्रयागराज। इन दिनों गांव-गांव में रामलीला का मंचन हो रहा है। रामलीला भारतीय संस्कृति और ग्रामीण समाज की महत्वपूर्ण सांस्कृतिक धरोहर है। वर्षों से गांवों में बच्चे, बुजुर्ग, महिलाएं और पुरुष एक साथ बैठकर श्रीराम के जीवन चरित्र का मंचन देखते आए हैं। इसके माध्यम से लोगों को मर्यादा, त्याग, प्रेम, कर्तव्य और धर्म का संदेश मिलता रहा है।
लेकिन बदलते समय के साथ रामलीला के मंचन में हास्य-व्यंग्य के नाम पर प्रस्तुत किए जाने वाले कुछ संवादों और अभिनय को लेकर सवाल उठने लगे हैं। चिंता इस बात की है कि कहीं मनोरंजन के नाम पर रामलीला के मूल उद्देश्य और धार्मिक पात्रों की गरिमा से समझौता तो नहीं किया जा रहा?
हास्य के नाम पर मर्यादा का उल्लंघन कितना उचित?
रामलीला के पवित्र मंच पर कभी-कभी ऐसे संवाद, इशारे और चुटकुले प्रस्तुत किए जाते हैं, जिन्हें लेकर दर्शकों का एक वर्ग असहज महसूस करता है। आरोप है कि कुछ प्रस्तुतियों में हास्य के नाम पर दोहरे अर्थ वाले संवाद, फूहड़ नकल और अशोभनीय इशारों का सहारा लिया जाता है। इससे रामायण के आदर्श पात्रों की गरिमा प्रभावित होने की आशंका रहती है।
जिस श्रीराम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है, माता सीता को त्याग और आदर्श का प्रतीक माना जाता है तथा हनुमान जी को भक्ति और शक्ति का स्वरूप माना जाता है, उन पात्रों से जुड़े प्रसंगों को केवल हंसी का माध्यम बना देना कितना उचित है? क्या लोगों को हंसाना ही रामलीला का उद्देश्य रह गया है? क्या मनोरंजन के लिए हमारे आराध्य पात्रों की गरिमा को नजरअंदाज किया जाना चाहिए?
हास्य रामलीला का हिस्सा हो सकता है और होना भी चाहिए, लेकिन उसकी एक सीमा और मर्यादा होनी जरूरी है। गोस्वामी तुलसीदास की रामचरितमानस में भी प्रसंगानुसार हास्य देखने को मिलता है, लेकिन उसका उद्देश्य कथा को रोचक बनाना और उसके संदेश को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करना था। हास्य ऐसा होना चाहिए, जो दर्शकों को आनंद दे और साथ ही धार्मिक प्रसंगों की गरिमा भी बनाए रखे।
दोहरे अर्थ वाले संवादों से दर्शकों में असहजता
जब मंच पर हास्य के नाम पर दोहरे अर्थ वाले संवाद, फूहड़ नकल और अशोभनीय इशारे प्रस्तुत किए जाते हैं, तो इसका असर पूरे दर्शक वर्ग पर पड़ता है। बुजुर्ग दर्शक असहज महसूस कर सकते हैं, महिलाएं ऐसी प्रस्तुतियों से असुविधा अनुभव कर सकती हैं और बच्चों के सामने भी गलत संदेश जाने की आशंका रहती है।
रामलीला देखने आने वाले परिवारों की अपेक्षा रहती है कि उन्हें धार्मिक कथा, आदर्श चरित्रों और संस्कारों से जुड़ी प्रस्तुति देखने को मिले। ऐसे में यदि मंचन का केंद्र मर्यादित कथा के बजाय फूहड़ मनोरंजन बन जाए, तो रामलीला के मूल उद्देश्य पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
रामलीला का मंच कोई तमाशा नहीं, संस्कारों का यज्ञ है
समाज को यह समझने की जरूरत है कि रामलीला का मंच केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक परंपरा और संस्कारों से जुड़ा आयोजन है। इसे एक यज्ञ की तरह पवित्रता और मर्यादा के साथ आयोजित किया जाना चाहिए।
जिस प्रकार यज्ञ में प्रत्येक आहुति के साथ शुद्धता और नियमों का ध्यान रखा जाता है, उसी प्रकार रामलीला के मंच पर भी भक्ति, सम्मान और मर्यादा का पालन होना चाहिए। मंच पर प्रस्तुत होने वाले प्रत्येक संवाद और प्रसंग में रामायण के पात्रों की गरिमा का ध्यान रखा जाना जरूरी है।
रामलीला कमेटियों से मर्यादा बनाए रखने की अपील
रामलीला के आयोजन को बेहतर और गरिमापूर्ण बनाए रखने के लिए कमेटियों, कलाकारों और गांव के जिम्मेदार लोगों की भूमिका महत्वपूर्ण है। इस दिशा में कुछ जरूरी कदम उठाए जा सकते हैं—
- मंचन से पहले स्क्रिप्ट की जांच: रामलीला की पटकथा और संवादों की पहले से समीक्षा की जाए। भगवान श्रीराम, माता सीता, लक्ष्मण और हनुमान जी सहित सभी पात्रों की गरिमा के विरुद्ध जाने वाले संवादों को हटाया जाए।
- हास्य कलाकारों को स्पष्ट निर्देश: कलाकारों को बताया जाए कि हास्य का उद्देश्य दर्शकों का मनोरंजन करना है, न कि फूहड़ता या अशोभनीय प्रस्तुति देना।
- बुजुर्गों और शिक्षित लोगों की भागीदारी: गांव के बुजुर्ग, पुजारी और शिक्षक रामलीला मंचन के मार्गदर्शक एवं संरक्षक बनें। वे आयोजन की मर्यादा बनाए रखने में अपनी भूमिका निभाएं।
आने वाली पीढ़ी को क्या संस्कार देंगे?
रामलीला केवल मनोरंजन का आयोजन नहीं, बल्कि संस्कारों की पाठशाला है। बच्चे और युवा इसके माध्यम से आदर्श जीवन, कर्तव्य, त्याग, सत्य, प्रेम और धर्म के बारे में सीखते हैं। यदि इसी मंच पर मर्यादा और सम्मान की सीमाएं टूटेंगी, तो आने वाली पीढ़ी तक कौन-सा संदेश पहुंचेगा?
इसलिए जरूरी है कि रामलीला की मूल भावना को बनाए रखा जाए। हास्य और मनोरंजन का स्वागत हो, लेकिन वह धार्मिक आस्था और पात्रों की गरिमा की कीमत पर नहीं होना चाहिए।
आइए, संकल्प लें कि रामलीला को फिर से भक्ति, मर्यादा और संस्कारों का उत्सव बनाएंगे। मंच को मंदिर के समान सम्मान देंगे। हंसेंगे और दूसरों को हंसाएंगे भी, लेकिन मर्यादा को हंसी में नहीं उड़ाएंगे।
क्योंकि जिस गांव में श्रीराम के आदर्शों और सम्मान का स्थान है, वहां संस्कारों और सद्भाव की परंपरा भी जीवित रहती है।
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Prayagraj, Ouuta Pradesh
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