श्री मद्भागवत वेदरुपी वृक्ष का पका हुआ फल है, इस रस का पान पिपासु बनकर ग्रहण करना चाहिए – पंडित मुरारी लाल पाराशर


डीग 5 मार्च| श्री मद्भागवत वेदरुपी वृक्ष का पका हुआ फल है,इस रस का पान पिपासु बनकर ग्रहण करना चाहिए।जब जब अवसर मिले भागवत ग्रहण करने में पीछे नही हटना चाहिए।जब मन अशुद्ध होता है तो संसार में लगता है,और जब मन शुद्ध होता है तो सिर्फ मन भगवान की कथा में लगता है यह वाक्य कस्वे के ऐतिहासिक लक्ष्मण मंदिर पर श्री शिवराम दास जी महाराज द्वारा आयोजित हो रही श्री मद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के व्यास पीठ पर विराजमान पूज्य लक्ष्मण मंदिर महंत पंडित मुरारी लाल पाराशर ने कहे।
उन्होने कहा कि जिसमें मानवता नही है वो मानव नही है।मानव वो है जो किसी के काम आ जाये।ईश्वर का भजन करें।किसी को तकलीफ़ न दे।और बड़ों को सम्मान दे यही मानवता है।व्यक्ति संसार में केवल कर्म लेकर आता है।इसलिए अच्छे कर्म करों।भाग्य,भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो।केवल सुनो ही नही भागवत की मानो भी।
पाराशर ने कहा कि श्रीमद् के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है।श्री यानी जब धन का अंहकार हो जाये तो श्री मद्भागवत सुन लो अंहकार दूर हो जायेगा।उन्होंने कहा कि कलयुग में मुक्ति का सबसे उत्तम साधन भागवत कथा का श्रवण व भगवान नाम का सुमिरन करना है।भागवत का अर्थ ज्ञान भक्ति और वैराग्य है। इन तीनों में से किसी एक की कमी होने पर ईश्वर की भक्ति प्राप्त नहीं होती। इसलिए हमें श्रीमद् भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए।प्रभु अपने भीतर है उसे अपने भीतर तलाश करो। राम का नाम अमृत समान है। जिससे उसका पान किया है।या उसका स्वाद चखा है वही राम नाम की महत्व को जान सकता है।


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