समीचीन ज्ञान का उदय होने पर अज्ञान अंधकार नष्ट हो जाता है


जैन धर्म के सोलह कारण व्रत पर्व में श्रद्धालु कर रहे है आराधना

बडोदिया| सम्यग्दर्शन धारण कर फिर पीछे सम्यग्ज्ञान को सेवन करना चाहिए। जो सम्यग्ज्ञान अनेक धर्मात्मक अपना और पर पदार्थों का ज्ञान कराने के लिए सूर्य के समान है । जिस प्रकार सूर्य का उदय होते ही अंधकार समाप्त हो जाता है उसी प्रकार समीचीन ज्ञान का उदय होने पर अज्ञान अंधकार नष्ट हो जाता है, इसलिए सम्यग्ज्ञान को सूर्य की उपमा दी गई है । यह विचार आर्यिका विज्ञानमति माताजी की परम शिष्या आर्यिका सुयशमति माताजी ने श्री आदिनाथ दिगम्बर जैन मंदिर बडोदिया में सोलहकारण पर्व के दौरान धर्म सभा को संबोधित करते हुए व्यक्त‍ किए। उन्होंने कहा कि जब तक किसी भी चिज का सत्य का बोध नही हो पाएगा तब अज्ञानतावश कार्य होना मान लेते है पर जब गुरूजनो के मुख से जिनवाणी खिरती है। उसको सुनने के बाद अज्ञान बने रहना पाप का कारण बनता है। आर्यिका उदितमति माताजी ने कहा कि जीवन में समय बदलते देर नही लगती। चंचल मन को एकाग्र करने की जरूरत है।आज के विचार कल के शब्द बनेंगे और शब्द क्रिया बनेगी। आर्यिका रजतमति माताजी ने कहा कि जो भगवान महावीर की जिनवाणी को आत्मसात कर लेगा वह भगवान बन जाएगा। जिनवाणी श्रवण करने का सौभाग्य सबको नही मिलता है,पूण्यवान ही जिनवाणी का श्रवण करता है और उस वाणी को अपने जीवन में उतार स्वयं का कल्याण करता है । संघ की मीना दीदी ने बताया कि सोलह कारण पर्व व्रत में विनोद चौखलिया,मीना देवी खोडणिया दीलीप तलाटी मितेश जैन,मयंक तलाटी,प्रियंका तलाटी,जयंत जैन, तक्ष जैन ये सभी आर्यिका संघ के सानिध्‍य में विशेष आराधना कर रहे है।

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