बड़ोदिया, बांसवाड़ा।अरुण जोशी। धर्म और वैराग्य का मार्ग अपनाकर ही आत्मा की उन्नति संभव है।सांसारिक मोह-माया से मुक्त होकर यदि व्यक्ति थोड़े समय के लिए भी निर्मोही बन जाए तो वह मोक्षमार्ग की दिशा में आगे बढ़ सकता है। यह विचार आर्यिका सिद्धश्री माताजी ने प्रवचन के दौरान व्यक्त किए।उन्होंने कहा कि वर्तमान पंचम काल में भले ही सीधे मोक्ष की प्राप्ति कठिन हो, लेकिन संतों और मुनियों की सेवा, देव-शास्त्र-गुरु में अटूट श्रद्धा और धर्म के प्रति समर्पण से आत्मा का कल्याण अवश्य होता है। आर्यिका माताजी ने कहा कि मनुष्य जीवन अत्यंत दुर्लभ है और इसकी आयु भी सीमित होती है। इसलिए जो समय हमें मिला है, उसमें धर्म की साधना और आत्मकल्याण का प्रयास करना चाहिए। यदि जीवन में निर्मोह भाव नहीं आया तो मनुष्य के लिए मुमुक्षु बनने का अवसर भी खो सकता है। उन्होंने बताया कि संसार में मोह, लोभ और आसक्ति ही दुखों का कारण हैं। जब तक मनुष्य इन बंधनों से मुक्त नहीं होता, तब तक वह आत्मिक शांति प्राप्त नहीं कर सकता।
उन्होंने कहा कि जैन धर्म का जिनशासन सदैव जयवंत रहा है और आगे भी रहेगा। जो लोग निग्रन्थ साधुओं के दर्शन और उनके उपदेशों से दूर रहते हैं, वे अपने जीवन के महत्वपूर्ण आध्यात्मिक अवसर को खो देते हैं। धर्म से दूर रहने वाले लोगों के जीवन में सुख-शांति की संभावना कम हो जाती है, जबकि संत-मुनियों के सान्निध्य में रहने से आत्मा की शुद्धि का मार्ग खुलता है। प्रवचन में उन्होंने यह भी बताया कि गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी व्यक्ति निर्मोही बन सकता है । यदि मन में वैराग्य और धर्म के प्रति श्रद्धा हो तो गृहस्थ भी मोक्षमार्ग का साधक बन सकता है । उन्होंने कहा कि एक क्षण के लिए भी यदि व्यक्ति निर्मोह भाव में स्थित हो जाए तो वह आत्मिक उन्नति की ओर बढ़ जाता है । यही भाव आगे चलकर उसे जिनेंद्र पद की दिशा में ले जाने की क्षमता रखता है। आर्यिका माताजी ने श्रद्धालुओं से कहा कि दुनिया के लोगों की बातों से प्रभावित होने की आवश्यकता नहीं है। व्यक्ति की आस्था और श्रद्धा जिनशासन के प्रति अटूट होनी चाहिए। जब मनुष्य अपने भीतर के गुणों को जागृत करता है और आत्मा की शुद्धि की दिशा में आगे बढ़ता है तो वह गुणस्थान की सीढ़ियों पर चढ़ते हुए अंततः परमात्मा बनने की क्षमता प्राप्त कर सकता है।इससे पूर्व आर्यिका संघ के सानिध्य में श्रीजी का जलाभिषेकवशांतिधारा के उपरांत सामुहिक रूप से पूजन के बाद आर्यिका सिद्ध श्री माताजी के प्रवचन हुए।