आचार्य 108 चंद्रगुप्त गुरुदेव के मुखारबिंद से “महावीर कथा” के आज के शीर्षक “अंत भला तो सब भला ” पर आज पंचम दिवस पर धर्मसभा में सभी श्रोता भाव विभोर हुए


कुशलगढ़, बांसवाड़ा।अरुण जोशी। दिगंबर बीस पंथी जैन समाज अध्यक्ष जयंतीलाल सेठ ने बताया कि आचार्य 108 चंद्रगुप्त गुरुदेव के सानिध्य में आज पंचम दिवस महावीर कथा के वाचन का शीर्षक “अंत भला तो सब भला ” पर गुरुदेव के प्रवचन बीस पंथी नोहरे में सम्पन्न हुए। सर्वप्रथम बीस पंथी आदिनाथ मंदिर जी में प्रातः पंचामृत अभिषेक हुआ तत्पश्चात गुरुदेव के सानिध्य में संपूर्ण समाज ने महावीर कथा का श्रवण किया। महावीर कथा में आज के मुख्य श्रोता एवं पाद प्रक्षालन का लाभ मनोज कुमार रौनक जयंतीलाल सेठ कुशलगढ़ परिवार को प्राप्त हुआ।गुरुदेव ने प्रवचन में महावीर कथा के पंचम दिवस में विषय “अंत भला तो सब भला” पर बताया कि कैसे महावीर भगवान का जीवन हमें सही मार्ग दिखाता है। महावीर स्वामी के पूर्व के भव के जीव सिंह का वर्णन करते हुए पूरी गाथा का श्रवण करवाया। मरीचि के जीव की विस्तृत कथा सुनाई गई और बताया गया कि किस प्रकार अहंकार और मिथ्यात्व के कारण जीव अनंत भवों में भटकता है। गुरुदेव ने अपने सारगर्भित प्रवचन में कहा कि सच्चा सुख बाहरी वस्तुओं में नहीं, अपितु आत्मचिंतन, संयम और सम्यक् दर्शन में निहित है। उन्होंने बताया कि क्रोध, मान, माया और लोभ को त्यागकर ही आत्मा की शुद्धि संभव है।महावीर स्वामी के पूर्व के भव सिंह और मुनिराज के बीच हुए चिंतन और वार्ता को संगीतमय कविता उपदेश के माध्यम से सभी के समक्ष रखा। महावीर स्वामी के आदर्शों को जीवन में उतारकर प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन को सफल और सार्थक बना सकता है। आगे बताते हुए गुरुदेव ने कहा कि महावीर स्वामी के पूर्व भवों में जीव ने अनेक उतार-चढ़ाव देखे, किंतु अंततः सत्य के मार्ग को अपनाया। मरीचि के जीवन से यह शिक्षा मिलती है कि ज्ञान होने पर भी यदि विनम्रता न हो, तो पतन निश्चित है।भगवान महावीर स्वामी के पूर्व भव में सिंह का जीवन हमें सिखाता है कि बल और अहंकार क्षणभंगुर हैं। हिंसा से मन अशांत होता है, जबकि करुणा से आत्मा निर्मल बनती है। एक साधु के दर्शन से सिंह का हृदय परिवर्तित हुआ — यही सत्संग की शक्ति है। जब क्रोध शांत होता है, तभी मोक्ष का मार्ग खुलता है। हर जीव में भगवान बनने की क्षमता छिपी है। अहंकार मनुष्य को सत्य से दूर कर देता है और भटकाव का कारण बनता है। पूर्व भव की कथाओं से स्पष्ट होता है कि कर्मों का बंधन ही जन्म-मरण के चक्र का कारण है। गुरुदेव ने समझाया कि सम्यक् श्रद्धा के बिना मोक्ष मार्ग का प्रारंभ संभव नहीं। उन्होंने कहा कि तप, त्याग और करुणा से ही आत्मा का उत्थान होता है। महावीर स्वामी ने अनेक भवों की साधना के बाद केवलज्ञान प्राप्त किया, जो अनंत धैर्य और संयम का परिणाम था।
जीव जब मोह और माया से मुक्त होता है, तभी उसे वास्तविक सुख की अनुभूति होती है। पूर्व भव की घटनाएं हमें सजग करती हैं कि प्रत्येक कर्म का फल अवश्य मिलता है। संचालन समाज मंत्री हसमुख सेठ ने किया।


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