कुशलगढ़: 17 नवंबर सन 1913 वह तिथि है जिस दिन मानगढ़ पर्वत पर अंग्रेजी व रियासती गठजोड़ी सशस्त्र फौजों से लड़ते हुए करीब डेढ़ हजार आदिवासी शहीद हुए जो प्रमुखतः भील थे। अब से मात्र करीब एक दशक पहले आदिवासी जलियांवाला नाम से अब जानी जाने वाली शहादत की उस घटना को वाकायदा सरकारी स्तर पर मान्यता मिली जब राजस्थान सरकार ने मानगढ़ पर्वत पर ग्रेनाइट का 54 फीट की ऊंचाई का शहीद स्मारक स्थापित किया।
बांसवाड़ा जिला मुख्यालय से 70 किलोमीटर की दूरी पर राजस्थान व गुजरात सीमा पर मानगढ़ शहीद स्थल अवस्थित है। जिसे पर्वत का शहीद स्थल अर्थात जहां आदिवासी पंचायत (मेला) पर फौजी हमला किया गया उस क्षेत्र का करीब 80 प्रतिशत हिस्सा राजस्थान में है एवं शेष हिस्सा गुजरात में। दोनों राज्यों में शहीद स्थल को लेकर सीमा विवाद भी चला जिसका बाद में समाधान कर लिया गया। कुछ ही वर्षों से गुजरात सरकार एवं वहां की अन्य संस्थाएं प्रतिवर्ष मर्गशीष पूर्णिमा को अपने क्षेत्र में तथा राजस्थान अर्थात आनंदपुरी ग्राम पंचायत एवं अन्य संगठन राजस्थान के इलाके में मेला व श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित करने लगे हैं। आदिवासी लोक के स्तर पर शहादत की घटना से कुछ वर्ष पूर्व तथा आजादी के बाद से निरंतर आंचलिक मेला आयोजन व शहीदों को श्रद्धांजलि के कार्यक्रम होते रहे हैं। आदिवासी प्रतिरोध के नायक गोविन्द गुरु ने शहादत की घटना से पहले लोगों में जागृति लाने के लिए विलायती शासन की खिलाफत उनके द्वारा रचे प्रसिद्ध गीत से की थी जिसकी मुख्य पंक्ति थी-‘’नी मानु रे भूरेटिया’ अर्थात रे भूरेटिया (अंग्रेज) मैं मानने वाला नहीं हूँ। मेरी लड़ाई लड़ता रहूंगा जो आदिवासियों के अधिकारों की और राष्ट्र की आजादी की लड़ाई है और मेरा लक्ष्य है अंततः दिल्ली की गद्दी प्राप्त करना। यह देश तुम्हारे चंगुल से आजाद होकर रहेगा। हम इसे आजाद कराएंगे।
तारीख को 17 नवंबर 1913 जब गोविन्द गुरु के नेतृत्व में गठित सम्प सभा की अगुवाई में तत्कालीन डूंगरपुर, बांसवाड़ा, मेवाड़, कुशलगढ़, प्रतापगढ़ व गुजरात की ईडर एवं संतरामपुर रियासतों के प्रमुखतः भील आदिवासियों ने ब्रिटिश राज व देषी रियासतों के शोषण तथा अत्याचारों के विरुद्ध लामबंद होकर आजादी के लिए अपनी लड़ाई लड़ी थी। आदिवासियों की एकजुटता व प्रतिरोध को ब्रिटिश व रजवाड़ी सत्ताओं ने विद्रोह की संज्ञा दी और उसे कुचलने का श ड़यंत्र रचा। विशेष रूप से डूंगरपुर महारावल विजय सिंह ने अंग्रेजी हुकूमत के सामने यह गुहार लगाई कि गोविन्द गुरु पृथक भील राज्य की घोषणा की स्थापना करना चाहते हैं और अगर ऐसा हुआ तो डूंगरपुर सहित देशी रियासतों का क्या होगा जिनकी अधिकांश प्रजा आदिवासी हैं।
मानगढ़ पर्वत पर हो रही आदिवासी पंचायत को चारों ओर से घेर कर रियासती फौज के साथ ब्रिटिश फौजी दस्तों ने हमला किया जिसमें घटनास्थल पर करीब 700-800 की संख्या में आदिवासी शहीद हुए। इलाज के अभाव में जो लोग घायल हुए उनमें से करीब इतनी ही संख्या में कुछ दिनों बाद मारे गए। आधिकारिक तथ्यों के आधार पर यह निष्कर्ष निकलता है कि करीब डेढ़ हजार आदिवासी उस घटना में मारे गए। मानगढ़ फौजी ऑपरेशन की योजना मेजर बैली ने बनाई थी और गोली चलाने का आदेश मेवाड़ भील कोर के तत्कालीन कमांडेंट कैप्टीन जे.पी. स्टॅाक्ले ने दिया था। फौज के सभी दस्ते आक्रमण से पहले मानगढ़ पर्वत से कुछ दूर स्थित आम्बादरा गांव में एकत्रित हुए थे। औपचारिकता के नाम पर गोविन्द गुरु द्वारा चयनित प्रतिनिधिमंडल के साथ अंग्रेज अफसरों की वार्ता हुई थी। घटना से पूर्व दिनांक 12 नवंबर एवं 14 नवंबर 1913 को ब्रिटिश फौजी कमांडर को लिखे गोविन्द गुरु के दो पत्र महत्वपूर्ण दस्तावेजों के रूप में उपलब्ध हैं जिनमें गोविन्द गुरु ने स्पष्ट किया था कि वह कोई हिंसक नायक नहीं है। उसके द्वारा गठित सम्प सभा का एकमात्र उद्देष्य आदिवासियों के साथ हो रहे जुल्मों का विरोध है, जिनमें बिना पारिश्रमिक बेगार लेना, वनोपज पर पाबंदी, शराब की ठेकेदारी, कृषि भूमि पर लिए जाने वाले लगान में वृद्धि एवं नीचे के कर्मचारियों द्वारा आए दिन आदिवासियों के साथ दुर्व्यवहार व बहन-बेटियों की बेइज्जती आदि शामिल था।गोविन्द गुरु सहित कुल करीब 900 आदिवासियों को मानगढ़ पर्वत से गिरफ्तार किया गया था। गोविन्द गुरु व उनके प्रमुख सहायक पूंजा सहित 38 कथित अभियुक्तों पर मुकदमा चलाया गया तथा शेष गिरफ्तार व्यक्तियों को छोड़ दिया गया। स्थापित विशेष अदालत ने संतरामपुर में मुकदमे की कार्रवाई की। इस अदालत ने अपना फेसला 11 फरवरी 1914 को सुनाया। आनन-फानन में मुकदमों की सुनवाई करने के बाद गोविन्द गुरु को फांसी की सजा दी गई लेकिन आदिवासी विद्रोह की आशंका को देखते हुए इस सजा को पहले आजीवन कारावास में फिर 10 साल में और अंततः डूंगरपुर रियासत से देश-निकाला की सजा में परिवर्तित किया गया। दिनांक 30 अक्टूबर, सन् 1931 के दिन झालोद तालुका (गुजरात) के कम्बोई गांव में गोविंद गुरू का देहांत हो गया।।
ये लेख डॉ. प्रवीण कुमार कटारा सहायक आचार्य राजकीय महाविद्यालय, छोटी सरवन, बांसवाड़ा ने लिखा है।