शंकरगढ़ क्षेत्र मेंअस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे ग्रामीण इलाकों के कुआं


यूं ही रहे हालात तो चुनिंदा बुजुर्गों के बाद प्राचीन इतिहास से बेखबर हो जाएगी नई पीढ़ी

प्रयागराज।ब्यूरो राजदेव द्विवेदी। जनपद के यमुनानगर विकासखंड शंकरगढ़ क्षेत्र अंतर्गत कभी जीवन रेखा माने जाने वाले मीठे पानी के कुआं मौजूदा समय में अपना अस्तित्व बचाने के संकट से जूझ रहे हैं। स्थिति यह है कि आधुनिकता की चकाचौंध में क्षेत्र के अधिकांश कुंए पूरी तरह से खंडहर हो चुके हैं। अगर हालात यूं ही रहे तो कुछ समय बाद गांव की ऐतिहासिक धरोहर का वजूद ही मिट जाएगा। नगरों से लेकर गांवों तक जीवन का आधार माने जाने वाले कुओं का अस्तित्व अब समाप्त होने के कगार पर पहुंच चुका है। जो भी कुएं बचे हुए हैं उसकी स्थिति भी जीर्ण-शीर्ण अवस्था में दिख रही है।कुओं की देखभाल नहीं होने के कारण पानी में गंदगी की भरमार है यही वजह है कि ग्रामीणों को कुएं का भी पानी मुवस्सर नहीं है। नल जल योजना तो दम तोड़ती दिख रही है सिर्फ टोंटियां शोपीस बनकर रह गई है। अगर यही स्थिति रही तो आने वाले समय में लोगों के लिए कुआं एक कहानी का हिस्सा बनकर रह जाएगा। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी कुओं की धार्मिक महत्ता कायम है शादी विवाह में धार्मिक अनुष्ठानों में कुआं की पूजा की जाती है। बावजूद इसके कुओं का अस्तित्व जिस तरह तेजी के साथ समाप्त हो जा रहा है आने वाले समय में सारी परंपराओं को समाप्त होने की संभावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता है।

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जल संरक्षण के लिए उपयोगी थे कुआं

एक दशक पूर्व सरकारी स्तर पर गांव में सिंचाई के उद्देश्य से कुओं का निर्माण करने का कार्य किया गया था। लेकिन कुछ ही दिनों में जवाहर रोजगार योजना के बंद हो जाने पर कुआं निर्माण में पूरी तरह से ग्रहण लग गया है। पूर्व में कुओं का पानी स्वच्छ रखने के लिए स्वास्थ्य विभाग द्वारा ब्लीचिंग एवं अन्य पाउडर का छिड़काव किया जाता था मगर संबंधित विभागों के उदासीन रवैया के कारण अधिकांश कुआं ध्वस्त हो जाने की वजह से अपना वजूद खो चुके हैं। यही वजह है कि जल संरक्षण के लिए उपयोगी माने जाने वाले कुओं में जल संरक्षण नहीं हो रहा है।


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