माता चंद्रघंटा की कथा आत्मज्ञान और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग
प्रयागराज।राजदेव द्विवेदी। माता चंद्रघंटा देवी दुर्गा का तीसरा स्वरूप है, जो अपने माथे पर अर्धचंद्र धारण करती हैं। उनका नाम चंद्रघंटा उनके माथे पर धारण किए गए अर्धचंद्र के कारण पड़ा है। माता चंद्रघंटा का स्वरूप अत्यंत सुंदर और आकर्षक है, जो भक्तों को आध्यात्मिक शक्ति और साहस प्रदान करता है। वह अपने हाथों में त्रिशूल, गदा, तलवार और कमल का फूल धारण करती हैं।
माता चंद्रघंटा की पौराणिक कथा
माता चंद्रघंटा की कथा के अनुसार, जब महिषासुर नामक राक्षस ने स्वर्ग और पृथ्वी पर हमला किया था, तब देवी दुर्गा ने चंद्रघंटा के रूप में अवतार लिया था। माता चंद्रघंटा ने अपने शक्तिशाली त्रिशूल से महिषासुर के अनुयायियों का नाश किया और महिषासुर को पराजित किया।
माता चंद्रघंटा की पूजा और महत्व
नवरात्रि के तीसरे दिन माता चंद्रघंटा की पूजा का विशेष महत्व है। उनकी पूजा करने से भक्तों को साहस, शक्ति और आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति होती है। माता चंद्रघंटा को कुंडलिनी जागरण की देवी भी माना जाता है, जो भक्तों को आत्म-ज्ञान और मोक्ष की प्राप्ति में मदद करती है।माता चंद्रघंटा की कृपा से भक्तों को जीवन में आने वाली चुनौतियों का सामना करने की शक्ति और साहस मिलता है। उनकी पूजा से जीवन में सुख-शांति और समृद्धि आती है।
2008 से लगातार पत्रकारिता कर रहे हैं। 2008 से 2019 तक सर्वोदय वार्ता, सर्वोदय वार्ता मैगजीन में। 2020 से 2021 तक इंडियन लाइव टीवी में । 2021 से 2023 तक दैनिक समाचार पत्र पूर्वांचल स्वर प्रयागराज में। 2023 से 2024 तक दैनिक समाचार पत्र लक्ष्मण नगर जंक्शन में। 2024 से अब तक लगातार दैनिक समाचार पत्र लक्ष्य सामग्र में। 2021 से अब तक आवाज आपकी न्यूज़ पोर्टल में पत्रकार हैं।