विकास की भेंट चढ़ीं गंगापुर सिटी की सड़कें, सीवरेज के अंतहीन काम ने शहर को बनाया ‘गड्ढापुर’


पूरे शहर का शर्मनाक हाल: धूल और गड्ढों के बीच सिसकती गंगापुर की जनता

जनता बेहाल!” “नगर परिषद की नींद नहीं टूटी: भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ीं गंगापुर की सड़कें, जनप्रतिनिधि मौन।”

विशेष रिपोर्ट:  गंगापुर सिटी, 24 अप्रैल।पंकज शर्मा। गंगापुर सिटी आज विकास की एक ऐसी त्रासदी झेल रहा है, जहाँ ‘विकास’ शब्द से ही आम जन को डर लगने लगा है। पिछले कई वर्षों से शहर में चल रहा सीवरेज लाइन का कार्य स्थानीय निवासियों के लिए जी का जंजाल बन गया है। आलम यह है कि शहर की कोई मुख्य सड़क हो, कोई मोहल्ला हो या संकरी गली, ऐसा कोई कोना अछूता नहीं रहा जहाँ सड़कों का सीना विकास के नाम पर न चीरा गया हो।

हर रास्ता बदहाल, हर मोड़ पर जोखिम

शहर की जीवन रेखा मानी जाने वाली मुख्य सड़कों से लेकर रिहायशी इलाकों की गलियों तक, हर जगह गहरे गड्ढे और बिखरी हुई गिट्टियाँ, उड़ती हुई धूल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर लगातार सवालिया निशान खड़ा कर रही हैं। सीवरेज डालने के लिए खोदी गई सड़कों को काम पूरा होने के बाद नियमानुसार वापस दुरुस्त किया जाना था, लेकिन ठेकेदारों और संबंधित विभागों की लापरवाही ने शहर को धूल के गुबार और हादसों के केंद्र में झोंक दिया है। स्टेशन रोड, सरकारी अस्पताल रोड, नसिया कॉलोनी, उदेई मोड़ और लगभग हर वार्ड, हर गली मोहल्ले में यही हाल है और पुराने शहर के अंदरूनी हिस्सों की हालत इतनी जर्जर है कि पैदल चलना भी दूभर हो गया है।

नगर परिषद की चुप्पी और ठेकेदारों की मनमानी

शहर की सड़कों का कचूमर निकालने में नगर परिषद की भूमिका सबसे संदिग्ध है। नियमानुसार, सीवरेज लाइन डालने के बाद सड़क को पूर्ववत स्थिति में लाने की जिम्मेदारी निर्माण एजेंसी की होती है, लेकिन गंगापुर सिटी में ठेकेदार मलबे और मिटटी को सड़कों पर ही छोड़कर रफूचक्कर हो रहे हैं। नगर परिषद के अधिकारी ऑफिसों में बैठकर फाइलों पर मुहर लगा रहे हैं, जबकि धरातल पर जनता टूटी हड्डियों और खराब वाहनों का दर्द झेल रही है। भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी के आरोपों के बीच सड़कों की मरम्मत का काम कागजों तक ही सीमित रह गया है।

प्रशासनिक उदासीनता और जनप्रतिनिधियों की चुप्पी

स्थानीय लोगों का कहना है कि वे इस नरक जैसी स्थिति में रहने के आदी हो चुके हैं। बार-बार शिकायतों के बावजूद प्रशासन की नींद नहीं टूट रही है। हैरानी की बात यह है कि बुनियादी ढांचे की हालत सुधरने के बजाय बिगड़ती जा रही है। जनप्रतिनिधि चुनावों के समय बड़े-बडे वादे करते हैं, लेकिन वर्तमान में सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, किसी के पास इस गंभीर समस्या का कोई ठोस समाधान नजर नहीं आता। जनता खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही है।

स्वास्थ्य और व्यापार पर भारी मार

टूटी सड़कों से उड़ने वाली धूल ने शहर के लोगों को सांस की बीमारियों और एलर्जी का शिकार बना दिया है। वहीं, सड़कों के बदहाल होने से बाजारों में ग्राहकों की आवाजाही कम हो गई है, जिसका सीधा असर स्थानीय व्यापार पर पड़ा है। आए दिन दोपहिया वाहन चालक इन गड्ढों में गिरकर चोटिल हो रहे हैं, लेकिन प्रशासन किसी बड़े हादसे के इंतजार में हाथ पर हाथ धरे बैठा है।

क्या प्रशासन की कोई जिम्मेदारी नहीं?

शहरवासियों का सवाल है कि आखिर कब तक वे विकास के नाम पर इस बर्बादी को झेलेंगे? क्या सीवरेज प्रोजेक्ट की कोई समय सीमा नहीं है? सड़कों के पेचवर्क और मरम्मत के लिए आने वाला बजट आखिर कहाँ खर्च हो रहा है?

गंगापुर सिटी की जनता अब केवल आश्वासनों से संतुष्ट होने वाली नहीं है। यदि जल्द ही इन सड़कों की सुध नहीं ली गई और शहर को इस गड्ढा-राज से मुक्ति नहीं मिली, तो आने वाले समय में जन-आक्रोश बड़ा आंदोलन का रूप ले सकता है। फिलहाल, शहर की स्थिति को देखते हुए इसे ‘गंगापुर सिटी’ के बजाय ‘गड्ढापुर सिटी’ कहना ज्यादा सही होगा।

 


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