उत्तराखंड क्रांति दल के वरिष्ठ नेता और राज्य आंदोलन के प्रमुख पैरोकार ने 66 वर्ष की उम्र में दिल्ली एम्स में ली अंतिम सांस
नैनीताल। नैनीताल के पूर्व विधायक एवं उत्तराखंड क्रांति दल के वरिष्ठ नेता डॉ. नारायण सिंह जंतवाल का नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में हृदयाघात के कारण आकस्मिक निधन हो गया। 66 वर्ष की उम्र में उनके निधन का समाचार मिलते ही सरोवर नगरी नैनीताल में शोक की लहर दौड़ गई। उनके आवास पर शोक व्यक्त करने वालों का तांता लग गया। उनके निधन से राजनीतिक, सामाजिक और शैक्षणिक जगत में गहरा दुख व्याप्त है।
आमजन के मुद्दों और आंदोलनों में हमेशा आगे खड़े होकर अपनी आवाज बुलंद करने वाले तथा न्याय के पक्ष में मजबूती से खड़े रहने वाले डॉ. जंतवाल की आवाज अब हमेशा के लिए खामोश हो गई है। उनके निधन से उत्तराखंड की क्षेत्रीय राजनीति में आम जनता और राज्य के हितों की पैरवी करने वाली एक महत्वपूर्ण आवाज का अंत हो गया।
उत्तराखंड राज्य आंदोलन और क्षेत्रीय मुद्दों के लिए आजीवन संघर्ष
डॉ. नारायण सिंह जंतवाल उत्तराखंड क्रांति दल के वरिष्ठ नेताओं में शामिल थे। वह उत्तराखंड क्रांति दल के पूर्व केंद्रीय अध्यक्ष भी रहे। उन्होंने उत्तराखंड राज्य गठन की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और राज्य के मुद्दों एवं हितों की आजीवन पैरवी की।
उनकी पहचान बेदाग छवि, आमजन के हितों के लिए संघर्ष, राजनीतिक शुचिता और नैतिक मूल्यों को जीवन में आत्मसात करने वाले नेता के रूप में रही। उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में इन सिद्धांतों का पालन किया और अपने संपर्क में आने वाले लोगों को भी नैतिकता एवं जनहित के रास्ते पर चलने की प्रेरणा दी।
स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों के बावजूद अंतिम समय तक रहे सक्रिय
बीते कुछ समय से स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों के चलते उनकी राजनीतिक सक्रियता में कमी जरूर आई थी, लेकिन राज्य के मुद्दों और उत्तराखंड क्रांति दल को मजबूती प्रदान करने के लिए वह अंतिम समय तक सक्रिय रहे। राज्य के हितों को लेकर उनकी प्रतिबद्धता उनके राजनीतिक जीवन की प्रमुख पहचान रही।
छात्र राजनीति से विधानसभा तक का सफर
डॉ. जंतवाल की छवि धैर्यवान, शांत, गंभीर और राजनीतिक शुचिता को महत्व देने वाले राजनेता की रही। उन्होंने कुमाऊं विश्वविद्यालय के नैनीताल स्थित डीएसबी परिसर में छात्र राजनीति से अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत की और वहां छात्र संघ अध्यक्ष रहे।
वह उत्तराखंड क्रांति दल के संस्थापक सदस्यों में भी शामिल थे। वर्ष 2002 में उत्तराखंड राज्य गठन के बाद हुए पहले विधानसभा चुनाव में उन्होंने नैनीताल विधानसभा सीट से जीत दर्ज की और विधायक चुने गए। विधायक के रूप में उन्होंने क्षेत्रीय राजनीति और उत्तराखंड के मुद्दों को मजबूती से उठाया।
परिवार में पत्नी और दो बेटियों को छोड़ गए
डॉ. नारायण सिंह जंतवाल अपने पीछे पत्नी डॉ. सावित्री कैड़ा जंतवाल और दो बेटियों को छोड़ गए हैं। उनकी पत्नी कुमाऊं विश्वविद्यालय, नैनीताल के इतिहास विभाग में प्रोफेसर हैं। उनके निधन से परिवार के साथ-साथ उनके परिचितों, समर्थकों और शुभचिंतकों में शोक का माहौल है।
राजनीतिक और सामाजिक संगठनों ने जताया गहरा दुख
डॉ. जंतवाल के निधन का समाचार मिलते ही नैनीताल में विभिन्न राजनीतिक दलों, उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारियों, व्यापार मंडल, श्री राम सेवक सभा समिति के सदस्यों, नव सांस्कृतिक सत्संग समिति शेर का डांडा, गणमान्य नागरिकों, पत्रकारों, आदर्श सूखाताल रामलीला समिति और तल्लीताल रामलीला समिति सहित विभिन्न संगठनों ने गहरा दुख व्यक्त किया।
उनके निधन पर कुमाऊं विश्वविद्यालय शिक्षक संघ (कूटा) के पदाधिकारियों एवं सदस्यों ने भी शोक संवेदना व्यक्त की।
कूटा और एलुमनी सेल के सदस्यों ने दी श्रद्धांजलि
कुमाऊं विश्वविद्यालय शिक्षक संघ (कूटा) की ओर से डॉ. ललित तिवारी, डॉ. नीलू, डॉ. दीपक, डॉ. युगल, डॉ. संतोष, डॉ. कुबेर गिनती, डॉ. अनिल बिष्ट, डॉ. दीपिका गोस्वामी और डॉ. अशोक कुमार ने डॉ. जंतवाल के निधन पर गहरा दुख जताया।
वहीं एलुमनी सेल की ओर से डॉ. बी.एस. कालाकोटी, डॉ. एस.एस. सामंत, डॉ. जी.सी. जोशी, ज्योति कांडपाल, डॉ. मीना पांडे और डॉ. भुवन आर्य ने भी शोक व्यक्त किया।
डॉ. नारायण सिंह जंतवाल के निधन से उत्तराखंड राज्य आंदोलन, क्षेत्रीय राजनीति और सामाजिक सरोकारों से जुड़े लोगों ने एक ऐसे नेता को खो दिया है, जो आमजन के मुद्दों पर अपनी आवाज बुलंद करने और न्याय के पक्ष में खड़े रहने के लिए जाने जाते थे। नैनीताल में उनके निधन से शोक का माहौल है।
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नैनीताल, उत्तराखंड
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