भीलवाड़ा नगर निगम चुनाव में नतीजे से पहले सियासी हलचल तेज


3.29 फीसदी कम मतदान और 154 निर्दलीयों ने बिगाड़ा गणित, भाजपा की बाड़ेबंदी के बीच 14 सितंबर को खुलेगा सत्ता का पिटारा

भीलवाड़ा। भीलवाड़ा नगर निगम चुनाव में मतदान पूरा होने के बाद अब नतीजों से पहले ही सियासी हलचल तेज हो गई है। नगर निगम बनने के बाद पहली बार हुए आम चुनाव में घटा मतदान प्रतिशत और बड़ी संख्या में मैदान में उतरे निर्दलीय प्रत्याशी अब राजनीतिक दलों के लिए सबसे बड़ा गणित बन गए हैं।

शहर की 70 वार्डों वाली चुनावी शतरंज में मतदाता अपना फैसला दे चुके हैं, लेकिन निगम की सत्ता की तस्वीर अभी साफ नहीं हुई है। अब राजनीतिक दलों की निगाहें 14 सितंबर को आने वाले चुनाव परिणाम पर टिकी हैं। इस बार घटा मतदान, कांग्रेस के 53 अधिकृत प्रत्याशी, भाजपा का सभी 70 वार्डों में उम्मीदवार उतारना और 154 निर्दलीयों की मौजूदगी ने सत्ता का रास्ता पहले से कहीं ज्यादा पेचीदा कर दिया है।

नतीजों से पहले ही भाजपा की ओर से प्रत्याशियों की बाड़ेबंदी शुरू किए जाने से सियासी हलकों में चर्चाएं और तेज हो गई हैं। वहीं, कांग्रेस फिलहाल परिणाम का इंतजार करती नजर आ रही है। इन परिस्थितियों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि नगर निगम का ताज किसके सिर सजेगा।

3.29 फीसदी कम मतदान ने बढ़ाई राजनीतिक बेचैनी

70 वार्डों वाले भीलवाड़ा नगर निगम में इस बार कुल 2,96,682 मतदाताओं में से 1,89,390 मतदाताओं ने मतदान किया। कुल मतदान प्रतिशत 63.84 प्रतिशत रहा।

वर्ष 2021 के नगर परिषद चुनाव में मतदान प्रतिशत 67.13 प्रतिशत था। इस तरह इस बार मतदान में 3.29 प्रतिशत की कमी आई है। अब राजनीतिक दल और प्रत्याशी इस बात का आकलन कर रहे हैं कि कम मतदान का फायदा किसे मिला और किसके चुनावी समीकरण पर इसका प्रतिकूल असर पड़ा।

मतगणना के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि कम मतदान प्रतिशत ने भाजपा, कांग्रेस या निर्दलीय प्रत्याशियों में से किसके पक्ष में चुनावी तस्वीर को प्रभावित किया।

भाजपा का राजनीतिक इतिहास रहा है मजबूत

भीलवाड़ा नगर परिषद के वर्ष 2000 से अब तक हुए छह चुनावों के राजनीतिक इतिहास पर नजर डालें तो भाजपा का दबदबा रहा है। इस अवधि में चार बार भाजपा का बोर्ड बना, जबकि एक बार कांग्रेस सत्ता में आई।

वर्ष 2000 में भाजपा के विनोद कुमार अग्रवाल चेयरमैन बने। इसके बाद वर्ष 2005 में कांग्रेस के ओमप्रकाश नराणीवाल ने सभापति की कमान संभाली।

वर्ष 2010 में फिर भाजपा का बोर्ड बना। इस दौरान भगवती लाल बहेड़िया सभापति बने। हालांकि, 29 अगस्त 2010 को उनके निधन के बाद दिनेश शर्मा ने 31 अगस्त से 15 दिसंबर 2010 तक कार्यवाहक सभापति की जिम्मेदारी संभाली। इसके बाद हुए उपचुनाव में अनिल बल्दवा सभापति बने।

वर्ष 2015 में भाजपा की ललिता समदानी चेयरमैन बनीं। बदले राजनीतिक समीकरणों के बीच उन्हें पद छोड़ना पड़ा। इसके बाद भाजपा की दीपिका कंवर, फिर ललिता समदानी, कांग्रेस की मंजू पोखरना और बाद में भाजपा की मंजू चेचाणी ने सभापति पद संभाला।

2021 में निर्दलीयों ने बनाया था सत्ता का गणित

वर्ष 2021 में भी नगर परिषद के 70 वार्ड थे। उस चुनाव में भाजपा को 31 वार्ड, कांग्रेस को 22 वार्ड और निर्दलीयों को 17 वार्ड मिले थे।

किसी भी एक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने के बाद राजनीतिक जोड़तोड़ के जरिए भाजपा ने बोर्ड बनाया और राकेश पाठक चेयरमैन बने। बाद में राज्य सरकार ने नगर परिषद को नगर निगम में क्रमोन्नत किया। इसके बाद राकेश पाठक भीलवाड़ा के पहले महापौर बने।

ऐसे में इस बार का चुनाव भाजपा के लिए केवल बोर्ड बनाने तक सीमित नहीं है। उसके सामने पिछले राजनीतिक वर्चस्व को कायम रखने की चुनौती भी है। वहीं, कांग्रेस के लिए भी यह चुनाव अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने और निगम की सत्ता में वापसी की कोशिश के लिहाज से महत्वपूर्ण है।

नतीजे से पहले भाजपा ने की प्रत्याशियों की बाड़ेबंदी

मतगणना में अभी समय है, लेकिन भाजपा ने परिणाम आने से पहले ही अपने प्रत्याशियों की बाड़ेबंदी शुरू कर दी है। भाजपा ने अपने सभी प्रत्याशियों को फोन कर बुलाया और देर रात बसों के जरिए उन्हें जयपुर की ओर रवाना किया।

इस दौरान सांसद दामोदर अग्रवाल, भाजपा जिलाध्यक्ष प्रशांत मेवाड़ा और पूर्व विधायक विट्ठलशंकर अवस्थी भी मौजूद रहे। बताया गया कि सभी प्रत्याशियों के मोबाइल फोन स्विच ऑफ करवा दिए गए।

इस घटनाक्रम के बाद चुनाव परिणाम से पहले ही राजनीतिक हलकों में चर्चाओं का दौर तेज हो गया। भाजपा की ओर से बाड़ेबंदी को अपने स्तर पर संगठनात्मक रणनीति बताया जा रहा है। हालांकि, राजनीतिक गलियारों में इसे बहुमत के आंकड़े को लेकर सतर्कता के तौर पर भी देखा जा रहा है।

कांग्रेस 53 पर सिमटी, भाजपा ने सभी 70 वार्डों में उतारे प्रत्याशी

इस चुनाव में दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों की चुनावी तैयारी में बड़ा अंतर दिखाई दिया। भाजपा ने सभी 70 वार्डों में अपने अधिकृत प्रत्याशी मैदान में उतारे, जबकि कांग्रेस महज 53 वार्डों में अधिकृत प्रत्याशी खड़े कर सकी।

कांग्रेस के कई प्रत्याशियों को समय पर चुनाव चिह्न नहीं मिल पाने का असर सीधे उसके चुनावी आंकड़े पर पड़ा। हालांकि, चुनावी मुकाबला केवल भाजपा और कांग्रेस तक सीमित नहीं रहा।

इस बार 154 निर्दलीय प्रत्याशियों ने भी चुनावी समीकरणों को उलझा दिया। कई वार्डों में निर्दलीय प्रत्याशी दोनों प्रमुख दलों के अधिकृत प्रत्याशियों को कड़ी टक्कर देते नजर आए। ऐसे में 14 सितंबर को आने वाला परिणाम केवल भाजपा और कांग्रेस की जीत-हार नहीं बताएगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि निर्दलीयों ने किस दल का चुनावी गणित बिगाड़ा।

कांग्रेस नतीजों के इंतजार में

दूसरी ओर कांग्रेस फिलहाल चुनाव परिणाम का इंतजार कर रही है। कांग्रेस के अधिकृत रूप से 53 प्रत्याशी ही चुनाव मैदान में थे।

कांग्रेस कार्यालय में गुरुवार को अपेक्षाकृत शांत माहौल रहा। पार्टी के प्रत्याशियों से बाड़ेबंदी को लेकर फिलहाल किसी पदाधिकारी के संपर्क किए जाने की जानकारी सामने नहीं आई है।

वहीं, निर्दलीय प्रत्याशी भी अभी राजनीतिक दलों से दूरी बनाए हुए हैं। किसी निर्दलीय प्रत्याशी ने फिलहाल किसी राजनीतिक दल से फोन आने या बाड़ेबंदी में बुलाए जाने की पुष्टि नहीं की है।

हालांकि, जिन वार्डों में निर्दलीय प्रत्याशियों का प्रदर्शन मजबूत रहा है, वहां परिणाम के बाद उनकी भूमिका अचानक महत्वपूर्ण हो सकती है। यदि दोनों प्रमुख दलों में से किसी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता है तो निर्दलीय सत्ता के समीकरण में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

154 निर्दलीयों ने उलझाया चुनावी गणित

इस बार नगर निगम चुनाव में 154 निर्दलीय प्रत्याशियों की मौजूदगी राजनीतिक दलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती मानी जा रही है। कई वार्डों में निर्दलीय प्रत्याशी सीधे भाजपा और कांग्रेस के अधिकृत प्रत्याशियों के सामने मजबूत चुनौती पेश करते नजर आए।

इसके अलावा कई वार्डों में बागियों ने भी अधिकृत प्रत्याशियों के सामने चुनौती खड़ी की है। ऐसे में परिणाम आने से पहले किसी भी दल के पक्ष में स्पष्ट तस्वीर बनाना आसान नहीं है।

यही वजह है कि 14 सितंबर की मतगणना को लेकर राजनीतिक दलों के साथ-साथ आमजन की नजर भी निर्दलीय प्रत्याशियों के प्रदर्शन पर टिकी है।

सबसे बड़ा सवाल भाजपा फिर बनाएगी बोर्ड या कांग्रेस करेगी वापसी

इस बार चुनाव में कम मतदान, कांग्रेस के कम अधिकृत प्रत्याशी, भाजपा का सभी 70 सीटों पर उतरना और 154 निर्दलीयों की मौजूदगी इन चारों फैक्टर ने निगम चुनाव का गणित बेहद दिलचस्प बना दिया है।

कई वार्डों में बागियों ने भी अधिकृत प्रत्याशियों के सामने चुनौती पेश की है। ऐसे में परिणाम से पहले शहर में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भाजपा एक बार फिर नगर निगम की सत्ता पर काबिज होगी या कांग्रेस राजनीतिक समीकरण पलटकर वापसी करेगी।

यदि किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला तो वर्ष 2021 की तरह एक बार फिर निर्दलीय पार्षद सत्ता की चाबी अपने हाथ में ले सकते हैं। ऐसी स्थिति में चुनाव परिणाम के बाद निर्दलीयों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो सकती है।

अब सभी निगाहें 14 सितंबर की मतगणना पर टिकी हैं। उसी दिन साफ होगा कि 70 वार्डों की जनता ने किसे नगर निगम की कमान सौंपी और किसके राजनीतिक दावों की हवा निकल गई।

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