भीषण गर्मी और पर्यावरण का संकट: क्या हम अपनी तबाही खुद लिख रहे हैं?

विकास की अंधी दौड़ ने छीनी धरती की हरियाली, अब संभलने का समय आ गया है

प्रयागराज।राजदेव द्विवेदी। उत्तर प्रदेश में धरती भट्टी की तरह धधक रही है। सूर्य का पारा सातवें आसमान पर पहुंच चुका है। आसमान से बरसती आग ने जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया है। लोग घरों में कैद होने को मजबूर हो गए हैं। साथ ही, कूलर और एयर कंडीशनर भी भीषण गर्मी के सामने बेअसर साबित हो रहे हैं।

जिम्मेदार कौन: सरकार या समाज? इस भयावह स्थिति का जवाब कड़वा और सीधा है। इसके लिए सरकार और समाज दोनों बराबर के जिम्मेदार हैं। विकास की अंधी दौड़ में पर्यावरण के साथ बड़ा खिलवाड़ हुआ है। सरकार ने बुनियादी ढांचे के नाम पर लाखों पेड़ कटवा दिए। हालाँकि, कागजों पर पौधे रोपने के दावे किए गए, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही रही।

स्वार्थ में खोई समाज की चेतना

समाज भी अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकता है। प्राचीन काल में पीपल और नीम जैसे वृक्षों को पवित्र माना जाता था। लेकिन, स्वार्थ के कारण हमने उन्हें काट दिया है। हमने कंक्रीट के जंगल तो खड़े कर लिए हैं। इसलिए, आज हम प्रकृति के कोप का सामना कर रहे हैं।

अब क्या करें? (समाधान की राह)

प्रकृति की यह चेतावनी बहुत गंभीर है। यदि हम अभी नहीं चेते, तो भविष्य में स्थितियां नियंत्रण से बाहर हो जाएंगी। सरकार और समाज को मिलकर ठोस कदम उठाने होंगे:

  • सख्त कानून: सरकार को वृक्षारोपण के लिए कड़े नियम बनाने होंगे।

  • जीवित रहने की गारंटी: जितने पेड़ कटें, उनसे पांच गुना अधिक पौधे जीवित रखने का लक्ष्य हो।

  • संस्कृति की ओर वापसी: समाज को पुनः वृक्षों के महत्व को समझना होगा।

  • सामूहिक प्रयास: केवल एसी की ठंडी हवाएं इस सुलगते पर्यावरण को नहीं बचा सकतीं।

निष्कर्षतः, यदि हमें अपनी धरती को दोबारा हरा-भरा बनाना है, तो हमें अपनी जीवनशैली में बदलाव करना ही होगा। अन्यथा, आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी।

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