वनस्पति विज्ञान विभागाध्यक्ष डॉ. ललित तिवारी ने हरेला पर्व के सांस्कृतिक, धार्मिक और पर्यावरणीय महत्व को विस्तार से बताया।
नैनीताल। हरेला पर्व 2026 के अवसर पर सरोवर नगरी नैनीताल सहित पूरे उत्तराखंड में यह लोकपर्व हर्षोल्लास और पारंपरिक उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। हरेला पर्व उत्तराखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक होने के साथ-साथ प्रकृति, हरियाली और पर्यावरण संरक्षण के प्रति लोगों की आस्था और समर्पण का संदेश भी देता है।
इस अवसर पर वनस्पति विज्ञान विभागाध्यक्ष डॉ. ललित तिवारी ने हरेला पर्व के धार्मिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि ‘हरेला’ प्रकृति और पर्यावरण को समर्पित उत्तराखंड का एक अनूठा लोकपर्व है। यह पर्व प्रकृति के प्रति हमारी निष्ठा, हरियाली के संरक्षण और सामाजिक समरसता की भावना को मजबूत करता है। उन्होंने कहा कि हरेला वास्तव में “हरे रंग का दिन” या हरियाली का प्रतीक है, जो मानसून के आगमन, कृषि के महत्व और सतत विकास की प्रेरणा देता है।
मिट्टी और सात अनाजों से होती है हरेला की शुरुआत
डॉ. ललित तिवारी ने बताया कि हरेला पर्व की शुरुआत मिट्टी से भरी एक टोकरी में पांच या सात प्रकार के अनाज जैसे जौ, गेहूं, मक्का, उड़द, गहत, भट्ट, धान, सरसों आदि बोने से होती है। कुछ दिनों बाद जब यह हरा होकर बढ़ जाता है, तब इसे काटा जाता है। इसके बाद सबसे पहले इसे इष्ट देवता को अर्पित किया जाता है और फिर परिवार के बुजुर्ग इसे सभी सदस्यों के सिर पर रखकर आशीर्वाद देते हैं।
उन्होंने बताया कि यह परंपरा अच्छी फसल, पर्यावरण संरक्षण, सुख-समृद्धि और परिवार की खुशहाली की कामना का प्रतीक मानी जाती है।
वर्ष में तीन बार मनाया जाता है हरेला पर्व
डॉ. तिवारी ने बताया कि हरेला वर्ष में तीन बार मनाया जाता है।
- चैत्र माह में प्रथम दिन बोया जाता है और नवमी को काटा जाता है।
- श्रावण माह में सावन शुरू होने से नौ दिन पहले बोया जाता है तथा श्रावण के प्रथम दिन काटा जाता है।
- आश्विन माह में नवरात्र के पहले दिन बोया जाता है और दशहरे के दिन काटा जाता है।
उन्होंने कहा कि चैत्र का हरेला गर्मी के आगमन, श्रावण का हरेला वर्षा ऋतु तथा आश्विन का हरेला सर्दी के आगमन का संकेत देता है। हालांकि सामाजिक दृष्टि से श्रावण मास में मनाया जाने वाला हरेला सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।
हरेला देता है पर्यावरण संरक्षण का संदेश
डॉ. ललित तिवारी ने कहा कि हरेला केवल धार्मिक पर्व नहीं बल्कि पर्यावरण संरक्षण का जनआंदोलन भी है। यह पर्व पौधारोपण, खेतों, बगीचों और जंगलों में नए पेड़ लगाने, मिट्टी का कटाव रोकने, जल संरक्षण तथा भूजल स्तर बढ़ाने के लिए लोगों को प्रेरित करता है।
उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन के दौर में हरेला का संदेश और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। यदि प्रकृति स्वस्थ रहेगी तो मानव जीवन भी स्वस्थ रहेगा। पेड़ वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित कर ग्लोबल वार्मिंग को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए हरेला आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित और हराभरा पर्यावरण बनाने का संकल्प भी है।
पौराणिक मान्यताओं से भी जुड़ा है हरेला
डॉ. तिवारी ने बताया कि पौराणिक मान्यता के अनुसार सावन के प्रथम दिन भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था, इसलिए इस दिन का विशेष महत्व माना जाता है।
उन्होंने एक प्राचीन कथा का उल्लेख करते हुए कहा कि एक समय भयंकर सूखा पड़ने पर लोगों ने भगवान शिव की कठोर तपस्या की थी। भगवान शिव प्रसन्न हुए और वर्षा कराकर धरती को हरियाली से भर दिया। तभी से हरेला पर्व को भगवान शिव के आशीर्वाद के रूप में भी पूजा जाता है।
लोक परंपरा के अनुसार लोग अपने हाथों से भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश की मिट्टी की प्रतिमाएं, जिन्हें ‘डीकारे’ कहा जाता है, बनाकर अच्छी फसल और अनुकूल मौसम की कामना करते हैं। इसके साथ ही पौधारोपण कर धरती को हरा-भरा बनाए रखने का संकल्प भी लेते हैं।
हरेला काटने के बाद मिलता है आशीर्वाद
हरेला काटने के बाद उसे कुल देवता को अर्पित किया जाता है। इसके बाद परिवार के बड़े सदस्य बच्चों और युवाओं के सिर पर हरेला रखकर ‘जीया जागया’ अर्थात दीर्घायु, स्वस्थ और सुखी जीवन का आशीर्वाद देते हैं।
डॉ. ललित तिवारी ने कहा कि हरेला पर्व उत्तराखंड की हिमालयी संस्कृति, प्रकृति प्रेम और पर्यावरण संरक्षण की सकारात्मक सोच का जीवंत उदाहरण है। उन्होंने पारंपरिक लोक आशीर्वाद—
“जी रया, जागि रया, दूबक जस जड़ हैजो, पात जस पौल हैजो, स्यालक जस वन त्राण हैजो, हिमालय में ह्यूं छन तक, गंगा में पानी छन तक, हरेला त्यार माने रया।”
—का उल्लेख करते हुए कहा कि यह संदेश मानव और प्रकृति के अटूट संबंध को दर्शाता है।
यह भी पढ़ें:

नैनीताल, उत्तराखंड
Aawaz Aapki News WhatsApp चैनल से जुड़ें:
सबसे तेज़ और ताज़ा खबरें सीधे अपने व्हाट्सएप पर पाएं।