अक्षय तृतीया (आखातीज) का महत्व


आदिवासी परंपरा के अनुसार यह उनके लिए वर्ष का अंतिम त्यौहार

कुशलगढ| आदिवासी परंपरा के अनुसार यह उनके लिए वर्ष का अंतिम त्यौहार होता है इस त्यौहार का काफी महत्व है । इस त्यौहार का शुभारंभ पूर्व रविवार से ही पूजा पाठ के साथ हो जाता है। (1) पुरुषों द्वारा भोजन तैयार करना अक्षय तृतीया के दिन आदिवासी पुरुष वर्ग इस आयोजन को बेहतर तरीके से मनाते हैं, इस दिन घर से बाहर पेड़ों के नीचे रसोई लगाई जाती है और दाल-पानिया, बाटी चूरमा आदि की तैयारी पुरुष ही करते हैं। मां बहने इस अवसर पर सहायक की भूमिका में रहती है। बड के पत्तों/ ढांक पत्ते पर शानदार पानिया तैयार करके कंडो पर शेखे जाते हैं। खाना बनने के बाद चूल्हा/अग्नि को भोग लगाया जाता है , फिर आसपास परिवार में खाना अदला- बदली करके फिर खाते। इससे प्यार मोहब्बत भाईचारा बना रहता है। (2)बच्चों द्वारा चीटियों को भोजन कराना इस सुअवसर पर बच्चों द्वारा हाथ में आटा, बाटी का महीन चूरमा देशी घी, शक्कर से बना हुआ लेकर चीटियों के बिलों को ढूंढ करके आटा और चूरमे को रखा जाता है। ऐसी मान्यता है कि ऐसा करने से बड़ा पुण्य मिलता है और प्रकृति में समस्त जीवो की पूजा के रूप में देखा जाता है। (3) आम ,नीम के पत्तों से तोरण का निर्माण करना जब शाम को पूरे रसोई का सामान घर में वापस रखने से पहले मैं दरवाजे या गेट पर आम के पत्ते से बने हुए तोरण को पहले बांधा जाता है इसके बाद में पूरा सामान अंदर रखा जाता है ऐसी मान्यता है इस दिन से आदिवासी परंपरा में एक नए मौसम का आगाज हो जाता है और खेती के कार्य ( चुड) में अगले दिन से लग जाते हैं। (4)पुरुष वर्ग द्वारा अगली फसल का आकलन ऐसी मान्यता है कि इस दिन खाना खाकर के दिन में कुछ टाइम के लिए पुरुष आराम(पेड़ों के निचे)करता है या नींद लेता है तो उस दिन जो सपना /आंकलन करता है उसमें यह क्लियर हो जाता है की अगली फसल के रूप में किस-किस का उत्पादन अच्छा होगा किसका नहीं होगा। (5)अक्षय तृतीया से ही खरीफ की फसलों की तैयारी शुरू अगले दिन से सभी किसान खेतों की जुताई ,सूड,काटेली झाड़ियां को साफ करना, गोबर खाद डालना का कार्य शुरू कर देते है। लेकिन इस कल्चर का अब थोड़ा महत्व कम होता जा रहा है ।नई जनरेशन को इसकी जानकारी होना बहुत जरूरी है आज भी आदिकाल से चली आ रही संस्कृति यदि जिंदा है तो गांव के कल्चर में जीवित है, हम सब मिलकर के इस कल्चर को जीवंत बनाए रखना है। ये जानकारी लालसिंह मईडा रेसला ब्लॉक अध्यक्ष कुशलगढ़ ने  दी।

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