ज्ञान गंगा महोत्सव में पुलकसागर महाराज ने इच्छाओं पर संयम, संतोष और सकारात्मक सोच को सुखी जीवन का आधार बताया।
भीलवाड़ा। राष्ट्र संत मनोज्ञाचार्य पुलकसागर महाराज ने कहा कि इंसान का तन भोजन से भर सकता है, लेकिन मन की इच्छाओं का कोई अंत नहीं होता। मन एक फूटी बाल्टी के समान है, जिसमें कितना भी पानी डाला जाए, वह भरती नहीं है। यदि इस फूटी बाल्टी में संतोष का पैंदा लगा दिया जाए तो जीवन आनंद और शांति से भर सकता है।
आचार्यश्री बुधवार को भीलवाड़ा में पहली बार हो रहे अपने चातुर्मास के दौरान श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर ट्रस्ट, मैन सेक्टर शास्त्रीनगर के तत्वावधान में सकल दिगम्बर जैन समाज की ओर से चित्रकूटधाम में आयोजित ज्ञान गंगा महोत्सव में श्रद्धालुओं को संबोधित कर रहे थे।
‘और’ नहीं, ‘बस’ बोलना सीखें
पुलकसागर महाराज ने संतोष को जीवन का सबसे बड़ा धन बताते हुए कहा कि जिसने संतोष प्राप्त कर लिया, उसे दुनिया के दूसरे धन की आवश्यकता नहीं रहती। उन्होंने जीवन को सुखी बनाने का सरल मंत्र बताते हुए कहा कि दुःखी होना है तो ‘और’ और सुखी होना है तो ‘बस’ बोलना सीखना चाहिए।
उन्होंने कहा कि ‘और’ शब्द में कोई पूर्णविराम नहीं होता। आज एक वस्तु चाहिए तो कल उससे अधिक की इच्छा पैदा हो जाती है। व्यक्ति इसी इच्छा के पीछे पूरी जिंदगी दौड़ता रहता है। इसके विपरीत ‘बस’ कहना सीख लेने से जीवन में संतोष का प्रवेश होता है। ‘और’ फूटी बाल्टी का प्रतीक है, जबकि ‘बस’ संतोष का प्रतीक है।
पर्णकुटी में भी आनंद, महलों में भी अशांति
आचार्यश्री ने कहा कि संतोष रूपी धन जिसके जीवन में आ गया, वह साधारण परिस्थितियों में भी आनंदपूर्वक रह सकता है। वहीं संतोष के अभाव में व्यक्ति महलों में रहकर भी बेचैन रहता है।
उन्होंने कहा कि परमात्मा से लगातार ‘और’ मांगने के बजाय जो मिला है, उसमें संतोष करना सीखना चाहिए। मन को कितना भी भरने का प्रयास किया जाए, वह इच्छाओं के कारण खाली ही दिखाई देता है। इसलिए जो प्राप्त हुआ है, उसके लिए परमात्मा का धन्यवाद करते हुए उसका आनंद लेना चाहिए।
उन्होंने कहा कि मृत्यु के बाद स्वर्ग की कल्पना करने के बजाय व्यक्ति को जीते-जी अपने जीवन को स्वर्ग बनाने का प्रयास करना चाहिए। उपलब्धियों की गिनती से अधिक जरूरी है कि जीवन में मिली चीजों के प्रति कृतज्ञता का भाव विकसित किया जाए।
एक गलत विचार रिश्तों पर फेर सकता है पानी
पुलकसागर महाराज ने मन में नकारात्मक विचारों को स्थान नहीं देने की अपील करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति के प्रति मन में आया एक गलत विचार वर्षों पुराने रिश्तों और दोस्ती को प्रभावित कर सकता है। इसलिए गलत विचारों को मन में पनपने से पहले ही रोकना चाहिए।
उन्होंने कहा कि विचार बदलते हैं तो आचरण बदलता है और आचरण बदलने के बाद परिस्थितियों को देखने का नजरिया भी बदल जाता है। एक बुराई कई अच्छाइयों पर भारी पड़ सकती है। इसलिए दूसरों की कमियां तलाशने के बजाय उनकी अच्छाइयों को देखने का प्रयास करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि यदि दृष्टि सद्भाव पर होगी तो दुनिया स्वर्ग जैसी लगेगी और यदि नजर केवल अभाव पर रहेगी तो यही दुनिया दुखद प्रतीत होगी। इसलिए जीवन में अपनी दृष्टि को अंधेरे के बजाय उजाले पर केंद्रित रखना चाहिए।
कल की चिंता में आज मत गंवाओ
आचार्यश्री ने कहा कि चिता मुर्दे को जलाती है, लेकिन चिंता जीते-जी इंसान को खोखला कर देती है। व्यक्ति को अगले पल की जानकारी नहीं होती, लेकिन वह आने वाले कई वर्षों के लिए संसाधन जुटाने में अपना वर्तमान खराब कर देता है।
उन्होंने कहा कि शरीर की बीमारी का उपचार संभव है, लेकिन मन की चिंता और तनाव से बाहर निकलने के लिए सकारात्मक सोच एवं संतुलित जीवन जरूरी है। व्यक्ति को कल की चिंता में आज को गंवाने के बजाय वर्तमान को बेहतर बनाने पर ध्यान देना चाहिए।
संतान और धन संचय के संदर्भ में उन्होंने कहा कि “पूत कपूत तो धन संचय क्यों और पूत सपूत तो धन संचय क्यों।” उनका आशय था कि योग्य संतान अपने जीवन को संभाल सकती है, जबकि अयोग्य संतान के लिए छोड़ा गया धन भी स्थायी सुख का आधार नहीं बन सकता।
परमात्मा की इच्छा पर विश्वास रखने का संदेश
पुलकसागर महाराज ने कहा कि दुनिया में हमेशा वही नहीं होता जो हम चाहते हैं। कई बार वही होता है जो परमात्मा की इच्छा होती है। यदि व्यक्ति को परमात्मा की इच्छा पर विश्वास है तो उसे परिस्थितियों को स्वीकार करते हुए सही कर्म करते रहना चाहिए।
उन्होंने कहा कि जीवन में संतोष, विश्वास और सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करने से व्यक्ति कठिन परिस्थितियों में भी मानसिक शांति बनाए रख सकता है।
18 दिन गूंजेगी पर्युषण की आराधना
आचार्यश्री ने आगामी पर्युषण महापर्व का उल्लेख करते हुए कहा कि अब त्याग और तपस्या की गंगा प्रवाहित होने वाली है। उन्होंने बताया कि पहले आठ दिन श्वेतांबर जैन समाज और इसके बाद दस दिन दिगंबर जैन समाज पर्युषण महापर्व मनाएगा।
उन्होंने कहा कि दोनों समाज यदि अलग-अलग पर्युषण मनाते हैं तो इस बार भीलवाड़ा में 18 दिन तक पर्युषण पर्व की आध्यात्मिक ऊर्जा और आराधना का वातावरण बनेगा। उन्होंने भावपूर्ण संदेश देते हुए कहा कि “उनके पर्युषण भी हमारे होंगे और हमारे पर्युषण भी उनके होंगे।”
दीप प्रज्वलन से हुआ प्रवचन का शुभारंभ
प्रवचन से पूर्व दीप प्रज्वलन, आचार्यश्री के पाद प्रक्षालन एवं शास्त्र भेंट का सौभाग्य महेन्द्रकुमार, दीपक एवं दिवित सोगानी परिवार को प्राप्त हुआ। समाजसेवी गोविन्द सोड़ाणी ने आचार्यश्री को श्रीफल समर्पित कर आशीर्वाद प्राप्त किया।
श्री पुलकसागर चातुर्मास समिति के अध्यक्ष प्रवीण चौधरी, संयोजक मनीष शाह, सह संयोजक लोकेश अजमेरा सहित पदाधिकारियों ने सौभाग्यशाली परिवार एवं अतिथियों का स्वागत किया। त्रिशला महिला मंडल की सदस्यों ने मंगलाचरण प्रस्तुत किया। आठ वर्षीय बालिका तक्ष्वी सोड़ाणी ने शिवपुराण मंत्रों की प्रस्तुति देकर श्रद्धालुओं को भावविभोर किया। कार्यक्रम का संचालन चातुर्मास समिति के संयोजक मनीष शाह ने किया।
चित्रकूटधाम में उमड़ा श्रद्धा का सैलाब
ज्ञान गंगा महोत्सव में भीलवाड़ा शहर सहित आसपास के विभिन्न क्षेत्रों से सर्व समाज के हजारों श्रद्धालु चित्रकूटधाम पहुंचे और आचार्यश्री के प्रवचनों का लाभ लिया। चातुर्मास के दौरान चित्रकूटधाम आध्यात्मिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।
ज्ञान गंगा महोत्सव के तहत 30 अगस्त तक प्रतिदिन सुबह 8:30 से 10 बजे तक चित्रकूटधाम में आचार्यश्री के प्रवचन होंगे। वहीं शाम 7 से 8 बजे तक आनंद यात्रा एवं आरती का आयोजन किया जा रहा है। इन कार्यक्रमों में शहर के विभिन्न क्षेत्रों से श्रद्धालु पहुंचकर धर्मलाभ ले रहे हैं।
पुलकसागर महाराज के प्रवचन का मूल संदेश यही रहा कि जीवन को सुखी बनाने के लिए दुनिया बदलने से अधिक जरूरी है कि व्यक्ति अपनी दृष्टि, विचार और इच्छाओं को बदले। मन की फूटी बाल्टी को ‘और’ से नहीं, बल्कि संतोष के ‘बस’ से ही भरा जा सकता है।
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Bhilwara, Rajasthan
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