लोकतंत्र की असली ताकत: निर्भय नागरिक, निष्पक्ष प्रशासन और स्वतंत्र न्यायपालिका ही हैं मजबूत आधार


प्रयागराज: राजदेव द्विवेदी का विशेष लेख—जब नागरिक की आवाज दबेगी और कानून का भय खत्म होगा, तब लोकतंत्र केवल औपचारिकता रह जाएगा

प्रयागराज (राजदेव द्विवेदी): लोकतंत्र केवल चुनाव कराने या सरकार चुनने का नाम नहीं है, बल्कि यह नागरिकों की स्वतंत्रता, समान अधिकारों और एक न्यायपूर्ण व्यवस्था की नींव पर टिका होता है। किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसके जागरूक और निर्भय नागरिकों में निहित होती है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रहार लोकतंत्र के लिए खतरा आज के दौर में लोकतंत्र की सबसे बड़ी चुनौती भय का वातावरण है। जब आम व्यक्ति बिना किसी दबाव या प्रताड़ना के अपनी बात शासन-प्रशासन के सामने रख पाता है, तभी लोकतंत्र जीवंत माना जाता है। यदि नागरिकों की आवाज दबाई जाएगी या उन्हें धमका कर चुप कराया जाएगा, तो यह व्यवस्था धीरे-धीरे खोखली होने लगेगी। इसलिए शासन को ऐसा सुरक्षित वातावरण बनाना चाहिए जहाँ हर व्यक्ति खुद को सम्मानित महसूस करे।

कानून का शासन और निष्पक्ष प्रशासन अनिवार्य लोकतंत्र की रक्षा के लिए उन शक्तियों पर कठोर कार्रवाई अनिवार्य है जो नागरिक अधिकारों का हनन करती हैं। चाहे वह राजनीतिक संरक्षण प्राप्त अपराधी हों या अराजक तत्व, कानून सभी पर समान रूप से लागू होना चाहिए। पुलिस और न्यायपालिका किसी भी राष्ट्र की रीढ़ होती हैं। यदि इनके कार्यों में राजनीतिक या बाहरी हस्तक्षेप बढ़ता है, तो पूरा लोकतांत्रिक ढांचा चरमरा जाता है।

जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही और संवैधानिक गरिमा अक्सर देखा जाता है कि राजनेता अपने प्रभाव का उपयोग जांच एजेंसियों और प्रशासन पर दबाव बनाने के लिए करते हैं। यह प्रवृत्ति लोकतंत्र की आत्मा के विरुद्ध है। जनप्रतिनिधियों का मुख्य दायित्व जनता की सेवा करना है, न कि प्रशासनिक तंत्र को अपने निजी हितों के लिए मोड़ना।

निष्कर्ष: समय की मांग एक मजबूत लोकतंत्र वही है जहाँ कानून सर्वोपरि हो और सत्ता जवाबदेह हो। आज आवश्यकता है कि शासन, प्रशासन, पुलिस और न्यायपालिका सभी संविधान की मर्यादा में रहकर कार्य करें। नागरिकों को भी अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होने के साथ-साथ कर्तव्यों का पालन करना होगा, तभी लोकतंत्र की आत्मा सुरक्षित रह पाएगी।

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