मतदान खत्म होते ही भाजपा के बाद कांग्रेस ने भी शुरू की बाड़ेबंदी, महापौर की कुर्सी के लिए निर्दलीयों पर टिकी नजर
भीलवाड़ा। भीलवाड़ा नगर निगम चुनाव में जनता ने अपना फैसला ईवीएम में बंद कर दिया है। अब 14 सितंबर को होने वाली मतगणना का इंतजार है, लेकिन राजनीतिक दलों के लिए चुनाव अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। मतदान थमते ही नगर निगम की सत्ता और महापौर की कुर्सी के लिए पर्दे के पीछे सियासी जोड़-तोड़ का दौर शुरू हो गया है।
महापौर की कुर्सी किसके हिस्से आएगी, इसका गणित अब सिर्फ भाजपा और कांग्रेस को मिलने वाली सीटों से तय नहीं होगा। निर्दलीय पार्षदों की संख्या, करीबी मुकाबलों वाले वार्ड और संभावित क्रॉस वोटिंग ने दोनों प्रमुख दलों की चिंता बढ़ा दी है। यही वजह है कि भाजपा के बाद कांग्रेस ने भी अपने संभावित पार्षदों को एकजुट रखने के लिए बाड़ेबंदी की कवायद शुरू कर दी है।
ईवीएम में बंद जनादेश, राजनीतिक दलों की निगाहें संभावित विजेताओं पर
ईवीएम में बंद जनादेश अभी सार्वजनिक नहीं हुआ है, लेकिन भाजपा और कांग्रेस अपने-अपने स्तर पर सीटों का आकलन करने में जुटे हैं। जिन वार्डों में मुकाबला कांटे का माना जा रहा है, वहां के प्रत्याशियों पर खास नजर रखी जा रही है।
परिणाम आने से पहले ही राजनीतिक दल यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि कौन जीत की स्थिति में है और कौन किस खेमे के करीब जा सकता है। बहुमत के आंकड़े और संभावित राजनीतिक समीकरणों को लेकर दोनों दलों ने अपने स्तर पर कवायद शुरू कर दी है।
पार्षद अब सिर्फ प्रत्याशी नहीं, महापौर चुनाव के निर्णायक मोहरे
नगर निगम के 70 वार्डों में मतदान के बाद अब सभी की निगाहें मतगणना पर टिकी हैं। किस दल को कितनी सीटें मिलती हैं और कितने निर्दलीय प्रत्याशी जीतकर निगम पहुंचते हैं, इसी पर नगर निगम की अगली सत्ता का गणित निर्भर करेगा।
महापौर पद के चुनाव में पार्षदों की भूमिका निर्णायक होने के कारण चुनाव मैदान में उतरे पार्षद अब सिर्फ प्रत्याशी नहीं, बल्कि महापौर चुनाव के संभावित निर्णायक मोहरे बन गए हैं। खास तौर पर निर्दलीय पार्षदों की भूमिका पर राजनीतिक दलों की नजर बनी हुई है।
बहुमत नहीं मिला तो निर्दलीयों की बढ़ेगी राजनीतिक अहमियत
किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने की स्थिति में निर्दलीय पार्षदों की राजनीतिक अहमियत अचानक बढ़ सकती है। मतदान खत्म होते ही राजनीतिक दलों ने संभावित जीत-हार के आंकड़ों पर मंथन शुरू कर दिया है।
प्रत्याशियों और स्थानीय नेताओं से लगातार फीडबैक लिया जा रहा है। वार्डवार समीकरणों को खंगाला जा रहा है और संभावित विजेताओं से संपर्क साधने की कोशिशें भी तेज होने की चर्चा है। हालांकि, अंतिम तस्वीर 14 सितंबर की मतगणना के बाद ही साफ होगी।
भाजपा के बाद कांग्रेस की भी बाड़ेबंदी की चर्चा
महापौर पद के चुनाव में पार्षदों की भूमिका निर्णायक होने के कारण राजनीतिक दल अपने-अपने खेमे को एकजुट रखने में जुट गए हैं। भाजपा की ओर से प्रत्याशियों को जयपुर भेजे जाने के बाद बाड़ेबंदी की चर्चा तेज हुई है।
दूसरी ओर कांग्रेस भी परिणामों के बाद बनने वाले संभावित समीकरणों पर नजर बनाए हुए है। कांग्रेस की ओर से भी संभावित पार्षदों को एक साथ रखने की कवायद को इसी सियासी रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। रिसॉर्ट्स में पार्षदों को साथ रखने की चर्चाओं ने नगर निगम की राजनीति को और गरमा दिया है।
154 निर्दलीयों ने बिगाड़े दोनों प्रमुख दलों के समीकरण
नगर निगम के चुनावी मैदान में बड़ी संख्या में निर्दलीय प्रत्याशियों के उतरने से भाजपा और कांग्रेस दोनों के समीकरण कई वार्डों में उलझे हुए हैं। 154 निर्दलीय प्रत्याशियों की मौजूदगी ने कई वार्डों में मुकाबले को त्रिकोणीय और बहुकोणीय बना दिया।
अब इनमें से कितने निर्दलीय प्रत्याशी जीतकर नगर निगम पहुंचते हैं, यही तय करेगा कि महापौर के चुनाव में उनकी भूमिका कितनी बड़ी होगी। यदि निर्दलीयों की संख्या प्रभावी रही तो सत्ता की चाबी उनके हाथों में जाने की संभावना से राजनीतिक दलों की चिंता बढ़ सकती है।
14 सितंबर को खुलेगा ईवीएम का फैसला
मतदाताओं ने अपना फैसला सुना दिया है। अब 14 सितंबर को मतगणना के साथ ईवीएम खुलेंगी और यह स्पष्ट होगा कि भीलवाड़ा नगर निगम की सत्ता की चाबी किस दल के हाथ में जाती है।
यदि आंकड़े किसी एक दल के पक्ष में स्पष्ट बहुमत देते हैं तो महापौर की कुर्सी तक पहुंचने का रास्ता अपेक्षाकृत आसान रहेगा। लेकिन यदि कोई दल बहुमत के आंकड़े से नीचे रहता है तो निर्दलीयों और संभावित बागियों की भूमिका अचानक बढ़ जाएगी।
महापौर की कुर्सी के लिए असली सियासी परीक्षा परिणाम के बाद
फिलहाल स्थिति यह है कि जनता का फैसला ईवीएम में बंद है और राजनीतिक दल अपने-अपने संभावित पार्षदों को सुरक्षित ठिकानों पर रखने में जुटे हैं। चुनाव मैदान में वोटों की लड़ाई खत्म हो चुकी है, लेकिन नगर निगम की सत्ता के लिए सियासी मुकाबला अब नए दौर में प्रवेश कर चुका है।
चुनाव परिणाम के बाद जिस दल के पास बहुमत का आंकड़ा होगा, उसके लिए महापौर की कुर्सी तक पहुंचने का रास्ता आसान रहेगा। लेकिन यदि सीटों का गणित बहुमत से नीचे रहा तो निर्दलीयों और संभावित बागियों की भूमिका निर्णायक हो सकती है।
ऐसे में महापौर की कुर्सी तक पहुंचने के लिए सिर्फ चुनाव जीतना पर्याप्त नहीं होगा। पार्षदों को साथ रखना, समर्थन जुटाना और अंतिम क्षण तक सियासी समीकरण साधना ही दोनों प्रमुख दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी।
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Bhilwara, Rajasthan
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