नैनीताल में नंदा सुनन्दा देवी महोत्सव आस्था के साथ प्रकृति संरक्षण का संदेश


कदली वृक्ष से मां नंदा सुनन्दा की प्रतिमाओं का निर्माण, ब्रह्म मुहूर्त में होगी प्राण प्रतिष्ठा और पूजा-अर्चना

नैनीताल। सरोवर नगरी नैनीताल समेत पूरे कुमाऊं मंडल में इन दिनों मां नंदा सुनन्दा के जयकारों की गूंज सुनाई दे रही है। पूरा कुमाऊं मंडल भक्ति के रस में डूबा नजर आ रहा है और जगह-जगह मां के भक्त धार्मिक आयोजनों में भाग ले रहे हैं। इसी क्रम में सामाजिक कार्यकर्ता एवं छात्र हर्षित जोशी ने जिला संवाददाता ललित जोशी से विशेष बातचीत में श्री नंदा सुनन्दा देवी महोत्सव से जुड़ी धार्मिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय परंपराओं के बारे में विस्तार से जानकारी दी।

मां नंदा सुनन्दा की मूर्ति का निर्माण किया जा रहा है। सुबह ब्रह्म मुहूर्त में मां नंदा सुनन्दा की प्राण प्रतिष्ठा के साथ पूजा-अर्चना की जाएगी।

उत्तराखंड की लोकसंस्कृति में मां नंदा का विशेष स्थान

हर्षित जोशी ने बताया कि उत्तराखंड की लोकसंस्कृति और धार्मिक परंपराओं में मां नंदा का विशेष स्थान है। कुमाऊं के लोगों की आराध्य देवी मां नंदा को हिमालय की पुत्री और माता पार्वती का स्वरूप माना जाता है।

नैनीताल में आयोजित होने वाला श्री नंदा सुनन्दा देवी महोत्सव इसी आस्था, लोकपरंपरा और सामुदायिक सहभागिता का प्रमुख पर्व है। यह महोत्सव धार्मिक आस्था के साथ कुमाऊं की लोकसंस्कृति और परंपराओं को भी सामने लाता है।

1903 में हुई थी नंदा देवी महोत्सव की शुरुआत

नैनीताल में नंदा देवी महोत्सव की शुरुआत वर्ष 1903 में हुई थी। इसके बाद वर्ष 1926 से श्रीराम सेवक सभा की ओर से महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है।

समय के साथ यह आयोजन नैनीताल की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है। महोत्सव में धार्मिक परंपराओं के साथ स्थानीय लोगों की सामुदायिक सहभागिता भी देखने को मिलती है।

डोला भ्रमण में नेपाली मजदूर भी करते थे सहयोग

श्री जोशी ने बताया कि सूत्रों के अनुसार 1980 के दशक से पहले तक मां नंदा-सुनन्दा का डोला भ्रमण कराने में नेपाली मजदूरों का भी सहयोग लिया जाता था।

यह परंपरा महोत्सव के सामुदायिक स्वरूप और समाज के विभिन्न वर्गों की सहभागिता को दर्शाती है। समय के साथ महोत्सव की परंपराओं में बदलाव आए, लेकिन मां नंदा के प्रति श्रद्धा आज भी लोगों के बीच बनी हुई है।

कदली वृक्ष से बनती हैं मां नंदा-सुनन्दा की प्रतिमाएं

नंदा देवी महोत्सव की सबसे विशिष्ट परंपराओं में कदली वृक्ष से मां नंदा-सुनन्दा की प्रतिमाओं का निर्माण शामिल है। कदली अर्थात केले का पौधा भारतीय परंपरा में पवित्र माना जाता है।

महोत्सव में कदली वृक्ष का धार्मिक महत्व होने के साथ-साथ इसका प्राकृतिक महत्व भी सामने आता है। प्राकृतिक सामग्री से प्रतिमा निर्माण की यह परंपरा पहाड़ की संस्कृति और प्रकृति के आपसी संबंध को दर्शाती है।

कदली के तने के साथ हरे बांस, कपास और कपड़े जैसी प्राकृतिक सामग्री का प्रयोग कर पारंपरिक कलाकार प्रतिमाओं को आकार देते हैं। यह स्थानीय लोककला और पारंपरिक ज्ञान को संरक्षित करने का भी माध्यम है।

मां नंदा की आस्था प्रकृति और हिमालय से जुड़ी

मां नंदा को हिमालय की पुत्री माना जाता है। यही कारण है कि मां नंदा की आराधना को हिमालय और उसकी प्रकृति के प्रति सम्मान से भी जोड़कर देखा जाता है।

हिमालय के जंगल, बुग्याल, नदियां, जलस्रोत और जैव विविधता यहां के सामाजिक और आर्थिक जीवन का महत्वपूर्ण आधार हैं। नंदा देवी की आस्था में प्रकृति के प्रति सम्मान की भावना भी दिखाई देती है।

नंदा देवी बायोस्फीयर रिजर्व का भी उल्लेख

नंदा देवी बायोस्फीयर रिजर्व हिमालयी जैव विविधता का महत्वपूर्ण क्षेत्र है। यहां पाई जाने वाली वनस्पतियां और वन्यजीव हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को समृद्ध बनाते हैं।

जंगल जलस्रोतों के संरक्षण, मिट्टी के कटाव को रोकने और पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे में नंदा देवी महोत्सव से जुड़ी प्राकृतिक परंपराएं पर्यावरण संरक्षण के संदेश से भी जुड़ती हैं।

प्राकृतिक सामग्री और स्थानीय जीवन-पद्धति से जुड़ा महोत्सव

महोत्सव में प्राकृतिक सामग्री के प्रयोग, पौधारोपण और प्लास्टिक से दूरी जैसे संदेशों को भी पर्यावरण संरक्षण से जोड़कर देखा जा सकता है।

पारंपरिक प्रसाद में स्थानीय अनाज का प्रयोग पहाड़ की कृषि और स्थानीय जीवन-पद्धति से इस पर्व के संबंध को दर्शाता है। धार्मिक परंपराओं के माध्यम से स्थानीय संस्कृति और प्रकृति के बीच संबंध भी सामने आता है।

जलवायु परिवर्तन के दौर में बढ़ी पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी

वर्तमान समय में ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन हिमालयी क्षेत्रों के सामने गंभीर पर्यावरणीय चुनौतियां हैं। ऐसे में नंदा देवी महोत्सव केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित न रहकर प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी का संदेश भी देता है।

मां नंदा के प्रति उत्तराखंड के लोगों की अगाध श्रद्धा में पहाड़ के प्राकृतिक संसाधनों, जंगलों, बुग्यालों और जैव विविधता के प्रति प्रेम और संरक्षण की भावना भी दिखाई देती है।

इस तरह नैनीताल का नंदा सुनन्दा देवी महोत्सव आस्था, लोकसंस्कृति और पर्यावरण संरक्षण को एक साथ जोड़ने वाली परंपरा के रूप में सामने आता है। इसमें अतीत की सांस्कृतिक विरासत के साथ वर्तमान और भविष्य के लिए भी प्रकृति संरक्षण का संदेश जुड़ा हुआ है।

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